शान्ति मन्त्र
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति: पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति: । वनस्पतये: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: सर्वँ शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि ॥ ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥Pages
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Zwani
October 17, 2009 – 11:35 pm
श्री-बृहत्-महा-सिद्ध-कुञ्जिका-स्तोत्रम्
July 22, 2009 – 9:32 pm
श्री-बृहत्-महा-सिद्ध-कुञ्जिका-स्तोत्रम्
॥शिव उवाच॥
शृणु देवि! प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिका-स्तोत्रमुत्तमम्। येन मन्त्र-प्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत्॥1॥
न कवचं नार्गला तु, कीलकं न रहस्यकम्। न सूक्तं नापि ध्यानं च, न न्यासो न च वाऽर्चनम्॥2॥
कुञ्जिका-पाठ-मात्रेण, दुर्गा-पाठ-फलं लभेत्। अति गुह्यतरं देवि! देवानामपि दुर्लभम्॥3॥
गोपनीयं प्रयत्नेन, स्वयोनिरिव पार्वति! मारणं मोहनं वश्यं, स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्धयेत्, कुञ्जिका-स्तोत्रमुत्तमम्॥4॥
ॐ श्रूं श्रूं श्रूं श्रं फट् ऐं ह्रीं ज्वालोज्ज्वल, प्रज्वल, ह्रीं ह्रीं क्लीं स्रावय स्रावय।
वशीष्ठ-गौतम-विश्वामित्र-दक्ष-प्रजापति-ब्रह्मा ऋषयः। सर्वैश्वर्य-कारिणी श्री दुर्गा देवता।
गायत्र्या शापानुग्रह कुरु कुरु हूं फट्।
ॐ ह्रीं श्रीं हूं दुर्गायै सर्वैश्वर्य-कारिण्यै, ब्रह्म-शाप-विमुक्ता भव।
ॐ क्लीं ह्रीं ॐ नमः शिवायै आनन्द-कवच-रुपिण्यै, ब्रह्म-शाप-विमुक्ता भव।
ॐ काल्यै काली ह्रीं फट् स्वाहायै, ऋग्वेद-रुपिण्यै, ब्रह्म-शाप-विमुक्ता भव।
शापं नाशय नाशय, हूं फट्॥ श्रीं श्रीं श्रीं जूं सः आदाय स्वाहा॥
ॐ श्लों हुं क्लीं ग्लौं जूं सः ज्वलोज्ज्वल मन्त्र प्रबल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।
नमस्ते रुद्र-रूपायै नमस्ते मधु-मर्दिनि।
नमस्ते कैटभारि च नमस्ते महिषार्दिनि॥1॥
नमस्ते शुम्भहन्त्री च, निशुम्भासुर-घातिनि॥2॥
नमस्ते जाग्रते देवि! जपं सिद्धिं कुरुष्व मे।
ॐ ऐंकारी सृष्टि-रूपायै ह्रींकारी प्रति-पालिका॥3॥
क्लींकारी काम-रूपिण्यै बीजरूपे! नमोऽस्तु ते।
चामुण्डा चण्ड-घाती च यैङ्कारी वर-दायिनी॥4॥
विच्चे त्व-भयदा नित्यं नमस्ते मन्त्र-रूपिणि॥5॥
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं हंसः-सोऽहं अं आं ब्रह्म-ग्रन्थि भेदय भेदय। इं ईं विष्णु-ग्रन्थि भेदय भेदय। उं ऊं रुद्र-ग्रन्थि भेदय भेदय।
अं क्रीं, आं क्रीं, इं क्रीं, इं हूं, उं हूं, ऊं ह्रीं, ऋं ह्रीं, ॠं दं, लृं क्षिं, ॡं णें, एं कां, ऐं लिं, ओं कें, औं क्रीं, अं क्रीं, अः क्रीं, अं हूं, आं हूं, इं ह्रीं, ईं ह्रीं, उं स्वां, ऊं हां, यं हूं, रं हूं, लं मं, बं हां, शं कां, षं लं, सं प्रं, हं सीं, ळं दं, क्षं प्रं, यं सीं, रं दं, लं ह्रीं, वं ह्रीं, शं स्वां, षं हां, सं हं लं क्षं॥
महा-काल-भैरवी महा-काल-रुपिणी क्रीं अनिरुद्ध-सरस्वति! हूं हूं, ब्रह्म-ग्रह-बन्धिनी, विष्णु-ग्रह-बन्धिनी, रुद्र-ग्रह-बन्धिनी, गोचर-ग्रह-बन्धिनी, आदि-व्याधि-ग्रह-बन्धिनी, सर्व-दुष्ट-ग्रह-बन्धिनी, सर्व-दानव-ग्रह-बन्धिनी, सर्व-देवता-ग्रह-बन्धिनी, सर्वगोत्र-देवता-ग्रह-बन्धिनी, सर्व-ग्रहोपग्रह-बन्धिनी! ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ॐ क्रीं हूं मम पुत्रान् रक्ष रक्ष, ममोपरि दुष्ट-बुद्धिं दुष्ट-प्रयोगाना् कुर्वन्ति, कारयन्ति, करिष्यन्ति, तान् हन। मम मन्त्र-सिद्धिं कुरु कुरु। मम दुष्टं विदारय विदारय। दारिद्रयं हन हन। पापं मथ मथ। आरोग्यं कुरु कुरु। आत्म-तत्त्वं देहि देहि। हंसः सोहम्। क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥
नव-कोटि-स्वरुपे, आद्ये, आदि-आद्ये अनिरुद्ध-सरस्वति! स्वात्म-चैतन्यं देहि देहि। मम हृदये तिष्ठ तिष्ठ। मम मनोरथं कुरु कुरु स्वाहा॥
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नीः! वां वीं वागेश्वरी तथा।
क्रां क्रीं क्रूं कुञ्जिका देवि! शां शीं शूं में शुभं कुरू॥
हूं हूं हूङ्कार-रूपायै, जां जीं जूं भाल-नादिनीं।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे ! भवान्यै ते नमो नमः॥7
ॐ अं कं चं टं तं पं सां विदुरां विदुरां, विमर्दय विमर्दय ह्रीं क्षां क्षीं क्षीं जीवय जीवय, त्रोटय त्रोटय, जम्भय जम्भय, दीपय दीपय, मोचय मोचय, हूं फट्, जां वौषट्, ऐं ह्रीं क्लीं रञ्जय रञ्जय, सञ्जय सञ्जय, गुञ्जय गुञ्जय, बन्धय बन्धय। भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे ! संकुच संकुच, सञ्चल सञ्चल, त्रोटय त्रोटय, म्लीं स्वाहा॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा, खां खीं खूं खेचरी तथा॥8
म्लां म्लीं म्लूं मूल-वीस्तीर्णा-कुञ्जिकायै नमो नमः॥
सां सीं सप्तशती देव्या मन्त्र-सिद्धिं कुरूश्व मे॥9
॥फल श्रुति॥
इदं तु कुंजिका स्तोत्रं मन्त्र-जागर्ति हेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं, गोपितं रक्ष पार्वति॥
विहीना कुञ्जिका-देव्या,यस्तु सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिः ह्यरण्ये रुदतिं यथा॥
॥इति श्रीरुद्रयामले, गौरीतन्त्रे, काली तन्त्रे शिव-पार्वती संवादे कुञ्जिका-स्तोत्रं॥
विशेषः- कोई भी दीक्षा-प्राप्त व्यक्ति इसका पाठ कर सकता है। निरन्तर सप्तशती का पाठ करनेवाला माँ जगज्जननी का भक्त सप्तशती के आरम्भ तथा अन्त में इसका पाठ अवश्य करे। “कुल्लुका महा-मन्त्र” के सम्बन्ध में संकेत मात्र है की- “क्रीम हूं स्त्रीं ह्रीं फट्” – इन ५ बीजों से जप के पूर्व कर-न्यास व हृदय-न्यास करने चाहिए।
सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम्
July 22, 2009 – 9:29 pm
सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम्
शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्षयामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजाप: शुभो भवेत्॥1॥
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥2॥
कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥3॥
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्धयेत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥4॥
अथ मन्त्र:
ॐ ऐं ह्री कीं चामुण्डायै विच्चे॥
ॐ ग्लौं हुं क्रीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्री क्रीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा
॥ इतिमन्त्र:॥
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नम: कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषर्दिनि॥1॥
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि॥2॥
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका॥3॥
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते।
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी॥4॥
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥5॥
धां धीं धूं धूर्जटे: पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥6॥
हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नम:॥7॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा॥8॥
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥
इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥
यस्तु कुञ्जिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥
भावार्थ :- शिवजी बोले- देवी! सुनो। मैं उत्तम कुञ्जिकास्तोत्र का उपदेश करूँगा, जिस मन्त्र के प्रभाव से देवी का जप (पाठ) सफल होता है॥1॥कवच, अर्गला, कीलक, रहस्य, सूक्त , ध्यान, न्यास यहाँ तक कि अर्चन भी (आवश्यक) नहीं है॥2॥केवल कुञ्जिका के पाठ से दुर्गा-पाठ का फल प्राप्त हो जाता है। (यह कुञ्जिका) अत्यन्त गुप्त और देवों के लिये भी दुर्लभ है॥3॥हे पार्वती! इसे स्वयोनि की भाँति प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये। यह उत्तम कुञ्जिकास्तोत्र केवल पाठ के द्वारा मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन आदि (आभिचारिक) उद्देश्यों को सिद्ध करता है॥4॥
मन्त्रः- ॐ ऐं ह्रीं क्रीं चामुण्डायै विच्चे॥
ॐ ग्लौं हुं क्रीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्रीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।
(मन्त्र में आये बीजों का अर्थ जानना न सम्भव है, न आवश्यक और न वाञ्छनीय। केवल जप पर्याप्त है।)
हे रुद्रस्वरूपिणी! तुम्हें नमस्कार। हे मधु दैत्य को मारने वाली! तुम्हें नमस्कार है। कैटभविनाशिनी को नमस्कार। महिषासुर को मारने वाली देवी! तुम्हें नमस्कार है॥1॥शुम्भ का हनन करने वाली और निशुम्भ को मारने वाली! तुम्हें नमस्कार है॥2॥हे महादेवि! मेरे जप को जाग्रत् और सिद्ध करो। ऐंकार के रूप में सृष्टिस्वरूपिणी, ह्रीं के रूप में सृष्टि-पालन करने वाली॥3॥ कीं रूप में कामरूपिणी तथा (निखिल ब्रह्माण्ड) की बीजरूपिणी देवी! तुम्हें नमस्कार है। चामुण्डा के रूप में चण्डविनाशिनी और यैकार के रूप में तुम वर देने वाली हो॥4॥ विच्चे रूप में तुम नित्य ही अभय देती हो। (इस प्रकार ऐं ह्रीं क्रीं चामुण्डायै विच्चे) तुम इस मन्त्र का स्वरूप हो॥5॥ धां धीं धूं के रूप में धूर्जटी (शिव) की तुम पत्नी हो। वां वीं वूं के रूप में तुम वाणी की अधीश्वरी हो। क्रां क्रीं क्रुं क्रे रूप में कालिका देवी, शां शीं शूं के रूप में मेरा कल्याण करो॥6॥ हुं हुं हुंकार स्वरूपिणी, जं जं जं जम्भनाशिनी, भ्रां भ्रीं भ्रूं के रूप में हे कल्याणकारिणी भैरवी भवानी! तुम्हें बार-बार प्रणाम॥7॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं इन सबको तोडो और दीप्त करो करो स्वाहा। पां पीं पूं के रूप में तुम पार्वती पूर्णा हो। खां खीं खूं के रूप में तुम खेचरी (आकाशचारिणी) अथवा खेचरी मुद्रा हो॥8॥ सां सीं सूं स्वरूपिणी सप्तशती देवी के मन्त्र को मेरे लिये सिद्ध करो। यह कुञ्जिकास्तोत्र मन्त्र को जगाने के लिये है। इसे भक्ति हीन पुरुष को नहीं देना चाहिय। हे पार्वती! इसे गुप्त रखो। हे देवी! जो बिना कुञ्जिका के सप्तशती का पाठ करता है उसे उसी प्रकार सिद्धि नहीं मिलती जिस प्रकार वन में रोना निरर्थक होता है।
।।इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिव-पार्वती संवादे कुञ्जिकास्तोत्रं।।
।।ॐ तत्सत्।।
यह स्तोत्र परम कल्याणकारी है। प्रतिदिन प्रात:काल इस स्तोत्र का पाठ करने से सब प्रकार के बाधा-विघ्न नष्ट हो जाते हैं। इस कुञ्जिकास्तोत्र तथा देवीसूक्त के सहित सप्तशती पाठ से परम सिद्धि प्राप्त होती है।
अष्ट-गन्ध
July 17, 2009 – 10:16 pm
अष्ट-गन्ध
‘यन्त्र’ लिखते समय अथवा पूजन में ‘अष्ट-गन्ध’ के सम्बन्ध में कुछ विशेष बातें इस प्रकार है-
देवताओं के लिए ‘अष्ट-गन्ध’ इस प्रकार है- (क) १॰ अगर, २॰ तगर, ३॰ गोरोचन, ४॰ कस्तूरी, ५॰ श्वेत-चन्दन, ६॰ लाल-चन्दन, ७॰ सिन्दूर और ८॰ केशर। अथवा, (ख) १॰ कपूर, २॰ कस्तूरी, ३॰ केशर, ४॰ गोरोचन, ५॰ संगरफ, ६॰ श्वेत-चन्दन, ७॰ अगर और ८॰ गेहूला। अथवा (ग) १॰ केशर, २॰ कस्तूरी, ३॰ कपूर, ४॰ हिंगलू, ५॰ श्वेत-चन्दन, ६॰ लाल-चन्दन, ७॰ अगर और ८॰ तगर।
देवी के लिए ‘अष्ट-गन्ध’ इस प्रकार है- (क) १॰ श्वेत-चन्दन, २॰ अगर, ३॰ हल्दी, ४॰ कुंकुंम, ५॰ गोरोचन, ६॰ शिलाजीत, ७॰ जटामांसी तथा ८॰ कपूर। अथवा (ख) १॰ १॰ श्वेत-चन्दन, २॰ अगर,३॰ जटामांसी या बालछड़, ४॰ देवदारु, ५॰ कूट, ६॰ केशर, ७॰ ख़सरो-जड़ (नागर-मोथा की एक उपजाति की जड़) और ८॰ नेत्र-जड़ (नागर-मोथा की एक अन्य उपजाति की जड़)। अथवा (ग) १॰ अगर, २॰ लाल-चन्दन, ३॰ हल्दी, ४॰ कुंकुंम, ५॰ गोरोचन, ६॰ जटामांसी, ७॰ शिलाजीत तथा ८॰ कपूर।
उपर्युक्त के अलावा ‘अष्ट-गन्ध’ के अन्य प्रकार भी हैं। सुविधानुसार किसी से कार्य किया जा सकता है- (क) १॰ अगर, २॰ तगर, ३॰ लाल-चन्दन, ४॰ कुंकुंम, ५॰ गोरोचन, ६॰ जटामांसी, ७॰ शिलाजीत और ८॰ कपूर। अथवा (ख) १॰ अगर, २॰ श्वेत-चन्दन, ३॰ लाल-चन्दन, ४॰ कुंकुंम, ५॰ गोरोचन, ६॰ जटामांसी, ७॰ शिलाजीत और ८॰ कपूर। अथवा (ग) १॰ अगर, २॰ तगर,३॰ कस्तूरी, ४॰ कुंकुंम, ५॰ श्वेत-चन्दन, ६॰ गोरोचन, ७॰ केशर और ८॰ हाथी का मद।
इनमें से किसी भी ‘अष्ट-गन्ध’ का प्रयोग किया जा सकता है। देवी को रक्त-चन्दन, कुंकुंम आदि अधिक प्रिय है। अतः देवी के भक्तों को ऐसे अष्ट-गन्ध का प्रयोग करना चाहिए, जिनमें यह अवश्य हो।
कार्य अथवा कामना के अनुसार भिन्न-भिन्न अष्ट-गन्ध के उल्लेख भी देखने में मिलता है। यथा, पुत्र-प्राप्ति-सम्बन्धी प्रयोग हेतु निम्न-लिखित अष्ट-गन्ध का प्रयोग करना चाहिए- १॰ श्वेत-चन्दन, २॰ लाल-चन्दन, ३॰ केशर, ४॰ कस्तरी, ५॰ गोरोचन, ६॰ कपूर, ७॰ अम्बर तथा ८॰ अगर।
रोग आदि निवारण हेतु निम्न-लिखित अष्ट-गन्ध का प्रयोग करना चाहिए- १॰ कपूर, २॰ चन्दन, ३॰ कुंकुंम, ४॰ देवदार, ५॰ गोरोचन, ६॰ केशर, ७॰ नागरमोथा तथा ८॰ नागरमोथा की जड़।
श्रीदुर्गा अष्टोत्तर-शत-नाम-स्तोत्र में अष्ट-गन्ध का दूसरा क्रम इस प्रकारदिया गया है- १॰ गोरोचन, २॰ लाख, ३॰ कुंकुंम, ४॰ सिन्दूर, ५॰ के्पूर, ६॰ घृत, ७॰ दूध तथा ८॰ मधु।
अष्ट-गन्ध की स्याही बनाते समय एक-एक वस्तु को क्रम से एक-एक अंश बढ़ाकर नाप से लेना चाहिए और खरल करना चाहिए। स्याही हेतु गंगा-जल, गुलाब-जल या इत्र का प्रयोग करना चाहिए।
पूजा के विविध उपचार
May 3, 2009 – 5:21 pm
पूजा के विविध उपचार
संक्षेप और विस्तार के भेद से पूजा के अनेकों प्रकार के उपचार हैं-
पञ्चोपचार-१॰ गन्ध, २॰ पुष्प, ३॰ धूप, ४॰ दीप और ५॰ नैवेद्य।
दस उपचार- १॰ पाद्य, २॰ अर्घ्य, ३॰ आचमन, ४॰ स्नान, ५॰ वस्त्र-निवेदन, ६॰ गन्ध, ७॰ पुष्प, ८॰ धूप, ९॰ दीप और १०॰ नैवेद्य।
सोलह उपचार- १॰ पाद्य, २॰ अर्घ्य, ३॰ आचमन, ४॰ स्नान, ५॰ वस्त्र-निवेदन, ६॰ आभूषण, ७॰ गन्ध, ८॰ पुष्प, ९॰ धूप, १०॰ दीप, ११॰ नैवेद्य, १२॰ आचमन, १३॰ ताम्बूल, १४॰ स्तव-पाठ, १५॰ तर्पण तथा १६॰ नमस्कार।
अठारह उपचार- १॰ आसन, २॰ स्वागत, ३॰ पाद्य, ४॰ अर्घ्य, ५॰ आचमन, ६॰ स्नान, ७॰ वस्त्र-निवेदन, ८॰ यज्ञोपवीत, ९॰ भूषण, १०॰ गन्ध, ११॰ पुष्प, १२॰ धूप, १३॰ दीप, १४॰ नैवेद्य, १५॰ दर्पण, १६॰ माला, १७॰ अनुलेपन तथा १८॰ नमस्कार।
छत्तीस उपचार- १॰ आसन, २॰ अभ्यञ्जन, ३॰ उद्वर्तन, ४॰ निरुक्षण, ५॰ सम्मार्जन, ६॰ सर्पिःस्नपन, ७॰ आवाहन, ८॰ पाद्य, ९॰ अर्घ्य, १०॰ आचमन, ११॰ स्नान, १२॰ मधुपर्क, १३॰ पुनराचमन, १४॰ यज्ञोपवीत-वस्त्र, १५॰ अलंकार, १६॰ गन्ध, १७॰ पुष्प, १८॰ धूप, १९॰ दीप, २०॰ नैवेद्य, २१॰ ताम्बूल, २२॰ पुष्पमाला, २३॰ अनुलेपन, २४॰ शय्या, २५॰ चामर, २६॰ व्यंजन, २७॰ आदर्श, २८॰ नमस्कार, २९॰ गायन, ३०॰ वादन, ३१॰ नर्तन, ३२॰ स्तुतिगान, ३३॰ हवन, ३४॰ प्रदक्षिणा, ३५॰ दन्तकाष्ठ तथा विसर्जन।
चौंसठ उपचार (शिवशक्ति पूजा में)- १॰ पाद्य, २॰ अर्घ्य, ३॰ आसन, ४॰ तैलाभ्यंग, ५॰ मज्जनशालाप्रवेश, ६॰ पीठोपवेशन, ७॰ दिव्यस्नानीय, ८॰ उद्वर्तन, ९॰ उष्णोदक-स्नान, १०॰ तीर्थाभिषेक, ११॰ धौतवस्त्रपरिमार्जन, १२॰ अरुण-दुकूलधारण, १३॰ अरुणोत्तरीयधारण, १४॰ आलेपमण्डपप्रवेश, १५॰ पीठोपवेशन, १६॰ चन्दनादि दिव्यगन्धानुलेपन, १७॰ नानाविधपुष्पार्पण, १८॰ भूषणमण्डपप्रवेश, १९॰ भूषणमणिपीठोपवेशन, २०॰ नवरत्नमुकुटधारण, २१॰ चन्द्रशकल, २२॰ सीमन्तसिन्दूर, २३॰ तिलकरत्न, २४॰ कालाञ्जन, २५॰ कर्णपाली, २६॰ नासाभरण, २७॰ अधरयावक, २८॰ ग्रथनभूषण, २९॰ कनकचित्रपदक, ३०॰ महापदक, ३१॰ मुक्तावली, ३२॰ एकावली, ३३॰ देवच्छन्दक, ३४॰ केयूरचतुष्टय, ३५॰ वलयावली, ३६॰ ऊर्मिकावली, ३७॰ काञ्चीदाम-कटिसूत्र, ३८॰ शोभाखयाभरण, ३९॰ पादकटक, ४०॰ रत्ननूपुर, ४१॰ पादांगुलीयक, चार हाथों में क्रमशः, ४२॰ अंकुश, ४३॰ पाश, ४४॰ पुण्ड्रेक्षुचाप, ४५॰ पुष्पबाण धारण, ४६॰ माणिक्यपादुका, ४७॰ सिंहासन-रोहण, ४८॰ पर्यङ्कोपवेशन, ४९॰ अमृतासवसेवन, ५०॰ आचमनीय, ५१॰ कर्पूरवटिका, ५२॰ आनन्दोल्लास-विलासहास, ५३॰ मंगलार्तिक, ५४॰ श्वेतच्छत्र, ५५॰ चामर-द्वय, ५६॰ दर्पण, ५७॰ तालवृन्त, ५८॰ गन्ध, ५९॰ पुष्प, ६०॰ धूप, ६१॰ दीप, ६२॰ नैवेद्य, ६३॰ आचमन तथा ६४॰ पुनराचमन, (ताम्बूल और वन्दना)।
राजोपचार- षोडशोपचार के अतिरिक्त छत्र, चामर, पादुका और दर्पण।
श्री हनुमद्ष्टोत्तर-शत-नामावली
April 27, 2009 – 9:34 pm
श्री हनुमद्ष्टोत्तर-शत-नामावली
ॐ आंजनेयाय विद्महे महाबलाय धीमहि तन्नो हनुमान प्रचोदयात्
ॐ आंजनेयाय नमः।
ॐ महा-वीराय नमः।
ॐ हनुमते नमः।
ॐ मारूतात्मजाय नमः।
ॐ तत्त्व-ज्ञान-प्रदाय नमः।
ॐ सीता-देवी-मुद्रा-प्रदायकाय नमः।
ॐ अशोक-वनिका-छेत्रे-नमः।
ॐ सर्व-माया-विभंजनाय नमः।
ॐ सर्व-बन्ध-विमोक्त्रे नमः।
ॐ रक्षो-विध्वंस-कारकाय नमः।
ॐ पर-विद्या-परीहाराय नमः।
ॐ पर-शौर्य-विनाशनाय नमः।
ॐ पर-मन्त्र-निराकत्र्रे नमः।
ॐ पर-यन्त्र-प्रभेदकाय नमः।
ॐ सर्व-ग्रह-विनाशाय नमः।
ॐ भीमसेन-सहाय-कृते नमः।
ॐ सर्व-दुःख-हराय नमः।
ॐ सर्व-लोक-चारिणे नमः।
ॐ मनोजवाय नमः।
ॐ पारिजात-द्रुम-मूलस्थाय नमः।
ॐ सर्व-मन्त्र-स्वरूपवते नमः।
ॐ सर्व-तन्त्र-स्वरूपाय नमः।
ॐ सर्व-यन्त्रात्मकाय नमः।
ॐ शिवाय नमः।
ॐ कपीश्वराय नमः।
ॐ महा-काव्याय नमः।
ॐ सर्व-रोग-हराय नमः।
ॐ प्रभवे नमः।
ॐ कपि-सेना-नायकाय नमः।
ॐ भविष्य-चतुराननाय नमः।
ॐ कुमार-ब्रह्मचारिणे नमः।
ॐ रत्न-कुण्डल-दीप्ति-मते नमः।
ॐ संचलद्-बाल-सन्नद्ध लम्बमान-शिखोज्जवलाय नमः।
ॐ गन्धर्व-विद्या-तत्त्वज्ञाय नमः।
ॐ महाबल-पराक्रममाय नमः।
ॐ कारागृह-विमोक्त्रे नमः।
ॐ श्रृंखला-बन्ध-मोचकाय नमः।
ॐ सागरोत्तारकाय नमः।
ॐ प्राज्ञाय नमः।
ॐ राम-दूताय नमः।
ॐ प्रताप-वते नमः।
ॐ वानराय नमः।
ॐ केसरी-सूनवे नमः।
ॐ सीता-शोक-निवारकाय नमः।
ॐ अंजना-गर्भ-सम्भूताय नमः।
ॐ बालार्क-सदृशाननाय नमः।
ॐ विभीषण-प्रियंकत्र्रे नमः।
ॐ दशग्रीव-कुलान्तकाय नमः।
ॐ लक्ष्मण-प्राण-दात्रे नमः।
ॐ बज्र-कायाय नमः।
ॐ महा-द्युतये नमः।
ॐ चिरंजीविने नमः।
ॐ राम-भक्ताय नमः।
ॐ दैत्य-कार्य-विघातकाय नमः।
ॐ अक्ष-हन्त्रे नमः।
ॐ कांचनाभाय नमः।
ॐ पंच-वक्त्राय नमः।
ॐ महा-तपसे नमः।
ॐ लंकिनी-भंजकाय नमः।
ॐ श्रीमते नमः।
ॐ सिंहिका-प्राण-भंजनाय नमः।
ॐ गन्धमादन-शैलस्थाय नमः।
ॐ लंकापुर-विनाशकाय नमः।
ॐ सुकण्ठ-सचिवाय नमः।
ॐ धीराय नमः।
ॐ शूराय नमः।
ॐ दैत्य-कुलान्तकाय नमः।
ॐ सुरार्चिताय नमः।
ॐ महा-तेजसे नमः।
ॐ राम-चूड़ामणि-प्रदाय नमः।
ॐ काम-रूपिणे नमः।
ॐ पिंगलाक्षाय नमः।
ॐ वार्घि-मैनाक-पूजिताय नमः।
ॐ कवलीकृत-मार्तण्ड-मण्डलाय नमः।
ॐ विजितेन्द्रियाय नमः।
ॐ राम-सुग्रीव-सन्धात्रे नमः।
ॐ महीरावण-मर्दनाय नमः।
ॐ स्फटिकाभाय नमः।
ॐ वागधीशाय नमः।
ॐ नव-व्याकृति-पण्डिताय नमः।
ॐ चतुर्बाहवे नमः।
ॐ दीन-बन्धवे नमः।
ॐ महात्मने नमः।
ॐ भक्त-वत्सलाय नमः।
ॐ संजीवन-शैल-हत्र्रे नमः।
ॐ शुचये नमः।
ॐ वाग्मिने नमः।
ॐ दृढ़-व्रताय नमः।
ॐ कालनेमि-प्रमथनाय नमः।
ॐ हरि-मर्कट-मर्कटाय नमः।
ॐ दान्ताय नमः।
ॐ शान्ताय नमः।
ॐ प्रसन्नात्मने नमः।
ॐ दश-कण्ठे-मदापहत्र्रे नमः।
ॐ योगिने नमः।
ॐ राम-कथा-लोलाय नमः।
ॐ सीतान्वेषण-पण्डिताय नमः।
ॐ वज्र-दंष्ट्राय नमः।
ॐ वज्र-नखाय नमः।
ॐ रूद्र-वीर्य-समुद्भवाय नमः।
ॐ इन्द्रजित्-ग्रहितामोघ-ब्रह्मास्त्र-विनिवारकाय नमः।
ॐ पार्थ-ध्वजाग्र-संवासिने नमः।
ॐ शर-पंजर-भेदकाय नमः।
ॐ दश-बाहवे नमः।
ॐ लोक-पूज्याय नमः।
ॐ जाम्बवत्-प्रीति-वर्धनाय नमः।
ॐ शाकिनी-डाकिनी-यक्ष-रक्षो-भूत-प्रभंजकाय नमः।
ॐ सीता-समेत-श्रीराम-पाद्सेवा-धुरन्धराय नमः।
निवास स्थान का चयन
April 27, 2009 – 9:22 pm
निवास स्थान का चयन
स्वरशास्त्रानुसार किसी व्यक्ति के निवास के लिये उपयुक्त नगर और उसकी दिशा का चयन करते हैं।
सबसे पहले हम निवास के लिये उपयुक्त नगर के चयन को लेते हैं। नगर का चयन दो प्रकार से किया जाता है।
१॰ नगर और व्यक्ति की नामराशियों से।
२॰ नगर और व्यक्ति की कांकिणी संख्या के अनुसार।
नगर और व्यक्ति की नामराशियों से-
व्यक्ति की नामराशि से नगर की नामराशि १, ३, ४, ६, ७, ८ और १२वीं हो तो इनका फल क्रमशः शत्रुता, हानि, रोग, हानि, शत्रुता, रोग और रोग लिखा है। तथा २, ५, ९, १० और ११ हो तो इसका फल शुभ माना गया है। इसे इस प्रकार भी समझ सकते हैं।
| नगर की राशि | व्यक्ति की नामराशि | |||||||||||
| मेष | वृष | मिथुन | कर्क | सिंह | कन्या | तुला | वृश्चिक | धनु | मकर | कुम्भ | मीन | |
| मेष | बैर | रोग | शुभ | शुभ | शुभ | रोग | बैर | हानि | शुभ | रोग | हानि | शुभ |
| वृष | शुभ | बैर | रोग | शुभ | शुभ | शुभ | रोग | बैर | हानि | शुभ | रोग | हानि |
| मिथुन | हानि | शुभ | बैर | रोग | शुभ | शुभ | शुभ | रोग | बैर | हानि | शुभ | रोग |
| कर्क | रोग | हानि | शुभ | बैर | रोग | शुभ | शुभ | शुभ | रोग | बैर | हानि | शुभ |
| सिंह | शुभ | रोग | हानि | शुभ | बैर | रोग | शुभ | शुभ | शुभ | रोग | बैर | हानि |
| कन्या | हानि | शुभ | रोग | हानि | शुभ | बैर | रोग | शुभ | शुभ | शुभ | रोग | बैर |
| तुला | शुभ | हानि | शुभ | रोग | हानि | शुभ | बैर | रोग | शुभ | शुभ | शुभ | रोग |
| वृश्चिक | रोग | बैर | हानि | शुभ | रोग | हानि | शुभ | बैर | रोग | शुभ | शुभ | शुभ |
| धनु | शुभ | रोग | बैर | हानि | शुभ | रोग | हानि | शुभ | बैर | रोग | शुभ | शुभ |
| मकर | शुभ | शुभ | रोग | बैर | हानि | शुभ | रोग | हानि | शुभ | बैर | रोग | शुभ |
| कुम्भ | शुभ | शुभ | शुभ | रोग | बैर | हानि | शुभ | रोग | हानि | शुभ | बैर | रोग |
| मीन | रोग | शुभ | शुभ | शुभ | रोग | बैर | हानि | शुभ | रोग | हानि | शुभ | बैर |
उदाहरण- श्री राजवीर सिंह चूरु में रहना चाहते हैं। क्योंकि उनकी नामराशि तुला से चूरु की नामराशि मेष सातवीं राशि है, अतः चूरु उनके लिये ठीक नहीं है। क्योंकि यहां उन्हें रोगग्रस्त रहना हो सकता है।
| राशि | प्रथमाक्षर |
| मेष | चू चे चो ला ली लू ले लो अ |
| वृष | इ उ इ ए ओ बा बी बु बे बो |
| मिथुन | का की कु घ ङ छु के को हा |
| कर्क | ही हु हे हो डा डी डू डे डो |
| सिंह | मा मी मू मे मो टा टी टू टे |
| कन्या | टो पा पी पू ष ण ठ पे पो |
| तुला | रा री रु रे रो ता ती तू ते |
| वृश्चिक | तो ना नी नू ने नो या यि यू |
| धनु | ये यो भा भी भु धा फा ढ़ा भे |
| मकर | भो जा जी खी खू खे खो गा गी |
| कुम्भ | गू गे गो सा सी सू से सो दा |
| मीन | दी दू थ झ ञ दे दो चा ची |
नगर और व्यक्ति की कांकिणी संख्या के अनुसार-
व्यक्ति की वर्गसंख्या को दोगुना कर उसमें नगर की वर्गसंख्या जोड़कर योगफल को आठ से भाग दें। जो शेष बचे वह उस व्यक्ति की कांकिणीसंख्या होगी।
इसी प्रकार नगर की वर्गसंख्या को दोगुना कर उसमें व्यक्ति की वर्गसंख्या जोड़कर योगफल को आठ से भाग दें। जो शेष बचे वह उस नगर की कांकिणीसंख्या होगी।
जिस नगर की कांकिणीसंख्या व्यक्ति की कांकिणीसंख्या से कम हो वह नगर व्यवसाय में लाभ की दृष्टि से उस व्यक्ति के निवास के लिये उपयुक्त होगा, अन्यथा नहीं। यदि नगर और व्यक्ति दोनों की कांकिणीसंख्या समान हो तो, वहां रहने से आय-व्यय बराबर रहता है। व्यक्ति की कांकिणीसंख्या नगर की कांकिणीसंख्या से जितनी अधीक होगी, वह नगर उस व्यक्ति के व्यवसाय के लिये उतना ही अधीक लाभप्रद रहेगा।
| वर्ग | वर्ग के वर्ण | वर्गेश | वर्ग संख्या | वर्ग की दिशा |
| अवर्ग | अ, इ, उ, ए, ऐ, ओ, औ | गरुढ़ | १ | पूर्व |
| कवर्ग | क, ख, ग, घ, ङ | मार्जार | २ | आग्नेय |
| चवर्ग | च, छ, ज, झ, ञ | सिंह | ३ | दक्षिण |
| टवर्ग | ट, ठ, ड, ढ, ण | श्वान | ४ | नैऋत्य |
| तवर्ग | त, थ, द, ध, न | सर्प | ५ | पश्चिम |
| पवर्ग | प, फ, ब, भ, म | मूषक | ६ | वायव्य |
| यवर्ग | य, र, ल, व | मृग | ७ | उत्तर |
| शवर्ग | श, ष, स, ह | मेष | ८ | ईशान |
उदाहरण- श्री राजवीर सिंह चूरु में रहना चाहते हैं। राजवीर सिंह की वर्गसंख्या ७ तथा चूरु की ३ है। अतः ७ * २ = १४ + ३ = १७ / ८ शेष बचा १ । यह राजवीर सिंह की कांकिणीसंख्या हुई।
३ * २ = ६ + ७ = १३ / 8 शेष बचे ५ । यह चूरु की कांकिणीसंख्या ५ हुई। अतः राजवीर सिंह की कांकिणीसंख्या चूरु की कांकिणीसंख्या से कम है, इसलिये राजवीर सिंह के लिये चूरु में रहना हानिप्रद है।
| नगर का वर्ग | कांकिणी | व्यक्ति का वर्ग | |||||||||||||||
| अवर्ग (१) | कवर्ग (२) | चवर्ग (3) | टवर्ग (4) | तवर्ग (5) | पवर्ग (6) | यवर्ग (7) | शवर्ग (8) | ||||||||||
| अवर्ग (१) | व्यक्ति | ३ | सम | 5 | लाभ | 7 | लाभ | 1 | हानि | 3 | हानि | 5 | लाभ | 7 | लाभ | 1 | हानि |
| नगर | ३ | 4 | 5 | 6 | |||||||||||||
| 7 | 0 | 1 | 2 | ||||||||||||||
| कवर्ग (२) | व्यक्ति | 4 | हानि | 6 | सम | 0 | हानि | 2 | लाभ | 4 | लाभ | 6 | लाभ | 0 | हानि | 2 | हानि |
| नगर | 5 | 6 | 7 | 0 | 1 | 2 | 3 | 4 | |||||||||
| चवर्ग (3) | व्यक्ति | 5 | हानि | 7 | लाभ | 1 | सम | 3 | लाभ | 5 | लाभ | 7 | लाभ | 1 | हानि | 3 | हानि |
| नगर | 7 | 0 | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | |||||||||
| टवर्ग (4) | व्यक्ति | 6 | लाभ | 0 | हानि | 2 | हानि | 4 | सम | 6 | लाभ | 0 | हानि | 2 | हानि | 4 | लाभ |
| नगर | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 0 | |||||||||
| तवर्ग (5) | व्यक्ति | 7 | लाभ | 1 | हानि | 3 | हानि | 5 | हानि | 7 | सम | 1 | लाभ | 3 | लाभ | 5 | लाभ |
| नगर | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 0 | 1 | 2 | |||||||||
| पवर्ग (6) | व्यक्ति | 0 | हानि | 2 | हानि | 4 | हानि | 6 | लाभ | 0 | हानि | 2 | सम | 4 | लाभ | 6 | लाभ |
| नगर | 5 | 6 | 7 | 0 | 1 | 2 | 3 | 4 | |||||||||
| यवर्ग (7) | व्यक्ति | 1 | हानि | 3 | लाभ | 5 | लाभ | 7 | लाभ | 1 | हानि | 3 | हानि | 5 | सम | 7 | लाभ |
| नगर | 7 | 0 | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | |||||||||
| शवर्ग (8) | व्यक्ति | 2 | लाभ | 4 | लाभ | 6 | लाभ | 0 | हानि | 2 | हानि | 4 | हानि | 6 | हानि | 0 | सम |
| नगर | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 0 | |||||||||
उपरोक्त दोनों प्रकारों (नामराशि तथा कांकिणीसंख्या) से जो नगर निवास के लिये उपयुक्त सिद्ध हो जाये, उसी नगर में रहना चाहिये।
नगर चयन हो जाने पर उस नगर में निवास योग्य दिशा का चयन करना चाहिये। यह भी दो प्रकार से किया जाता हैः-
१॰ व्यक्ति की नामराशियों से।
२॰ व्यक्ति के वर्ग के आधार पर।
व्यक्ति की नामराशियों से
|
व्यक्ति की नामराशि |
नगर की दिशाएं | ||||||||
| पूर्व | आग्नेय | दक्षिण | नैऋत्य | पश्चिम | वायव्य | उत्तर | ईशान | मध्य | |
| मेष | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | अशुभ | शुभ | शुभ |
| वृष | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | अशुभ |
| मिथुन | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | अशुभ |
| कर्क | शुभ | शुभ | शुभ | अशुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ |
| सिंह | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | अशुभ |
| कन्या | शुभ | शुभ | अशुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ |
| तुला | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | अशुभ | शुभ | शुभ | शुभ |
| वृश्चिक | अशुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ |
| धनु | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | अशुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ |
| मकर | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | अशुभ |
| कुम्भ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | अशुभ | शुभ |
| मीन | शुभ | अशुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ | शुभ |
व्यक्ति के वर्ग के आधार पर:-
|
व्यक्ति का वर्ग |
नगर की दिशाएं | ||||||||
| पूर्व | आग्नेय | दक्षिण | नैऋत्य | पश्चिम | वायव्य | उत्तर | ईशान | मध्य | |
| अवर्ग | श्रेष्ठ | शुभ | शुभ | सामान्य | अशुभ | सामान्य | शुभ | शुभ | शुभ |
| कवर्ग | शुभ | श्रेष्ठ | शुभ | शुभ | सामान्य | अशुभ | सामान्य | शुभ | शुभ |
| चवर्ग | शुभ | शुभ | श्रेष्ठ | शुभ | शुभ | सामान्य | अशुभ | सामान्य | शुभ |
| टवर्ग | सामान्य | शुभ | शुभ | श्रेष्ठ | शुभ | शुभ | सामान्य | अशुभ | शुभ |
| तवर्ग | अशुभ | सामान्य | शुभ | शुभ | श्रेष्ठ | शुभ | शुभ | सामान्य | शुभ |
| पवर्ग | सामान्य | अशुभ | सामान्य | शुभ | शुभ | श्रेष्ठ | शुभ | शुभ | शुभ |
| यवर्ग | शुभ | सामान्य | अशुभ | सामान्य | शुभ | शुभ | श्रेष्ठ | शुभ | शुभ |
| शवर्ग | शुभ | शुभ | सामान्य | अशुभ | सामान्य | शुभ | शुभ | श्रेष्ठ | शुभ |
हस्तरेखा और आर्थिक सम्पन्नता
April 26, 2009 – 2:25 pm
हस्तरेखा और आर्थिक सम्पन्नता
॰ यदि अंगुलियों कर पर्व लम्बे हो तो जातक धनी होने के साथ-साथ दीर्घायु भी प्राप्त करता है।
॰ यदि कनिष्ठा अँगुली का नाखुन अनामिका अँगुली के द्वितीय पर्व से आगे निकलकर तीसरे पर्व तक जाये तो जातक को कभी भी धन का अभाव नहीं होता।
॰ यदि कनिष्ठा एवं अनामिका अँगुली के आपस में सटाने के उपरान्त मध्य छिद्र रहे तो वृद्धावस्था में आर्थिक कष्ट का सामना करना पड़ सकता है।
॰ यदि मध्यमा तथा अनामिका के मध्य छिद्र हो तो जातक को युवावस्था में आर्थिक कष्ट का सामना करना पड़ सकता है।
॰ यदि मध्यमा और तर्जनी के मध्य छिद्र हो तो बाल्यावस्था में आर्थिक कष्ट हो।
॰ यदि किसी भी अँगुली के मध्य छिद्र न हो तो जातक का जीवन धन-धान्य से सम्पन्न रहता है।
॰ यदि मध्यमा अँगुली के तीसरे पर्व में अनामिका आकर मिल गई हो तो ऐसा जातक विद्वान, विचारवान्, साहित्यकार तथा कलाप्रेमी होता है तथा इस क्षेत्र में धन व यश की प्राप्ति करता है।
॰ अनामिका अँगुली सीधी, लम्बी तथा पुज़्ट होने पर जातक धनोपार्जन में प्रवीण, अनामिका टेढ़ी-मेढ़ी होने पर जातक दृढ़ रहकर धनोपार्जन करता है।
॰ अनामिका का झुकाव कनिष्ठा की ओर हो तो जातक कार्य-व्यापार द्वारा धन व सम्मान अर्जित करता है।
॰ अनामिका तर्जनी के बराबर लम्बी हो, उसका पहला पर्व चपटा एवं लम्बा हो तो जातक को धन व यश की प्राप्ति होती है।
॰ अनामिका का तीसरा पर्व लम्बा हो, संधि की गांठे उन्नत हो तो बिना किसी चिन्ता के धनोपार्जन में लगा रहता है।
॰ यदि कनिष्ठा अनामिका के प्रथम पर्व को स्पर्श करती हो तो जातक यात्रा द्वारा धन की प्राप्ति करता है।
॰ महीन, स्पष्ट व गहरी भाग्य रेखा मणिबन्ध से शनि पर्वत तक जाती हो तो मनुष्य के उद्योग धंधे में दिन-प्रतिदिन आय का स्तर बढता है।
॰ चन्द्र पर्वत से भाग्य रेखा गुरु पर्वत पर पहुँच जाए तो व्यक्ति का भाग्योदय चिचाह उपरान्त या स्त्री के द्वारा होता है।
॰ स्पष्ट चार रेखाऐं मणिबंध पर यवाकार हो तो व्यक्ति जन्म से ही धनवान होता है।
॰ अंगुठे के दोनों ऊपरी पर्वों का बराबर व कठोर होना धन एवं व्यापार वृद्धिकारक माना गया है।
॰ सूर्य पर्वत का उभरा हुआ होना, स्पष्ट एक रेखा का होना व चन्द्र पर्वत से भाग्य रेखा का निकलना धनागम का संकेत होता है।
॰ मणिबंध के बीच क्रॉस, यव चिह्न होने पर जातक को वसीयत के द्वारा धन की प्राप्ति होती है। यदि हथेली के नीचे मणिबंध की चार रेखाएं यवाकार हो तो ऐसा जातक ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करता है।
॰ यदि जीवन रेखा से छोटी रेखायें निकलकर ऊपर की ओर जाए तो जातक उस आयु विशेष में धन एवं सम्मान प्राप्त करता है।
॰ यदि दोनों हाथों में मस्तिष्क रेखा लम्बी हो तथा चन्द्र पर्वत पर घुमावदार हो, चन्द्र पर्वत बलवान हो एवं अनामिका तथा मध्यमा अंगुली बराबर लम्बाई की हो तो जातक व्यापारी होता है। व्यापार-व्यवसाय में आकस्मिक धन प्राप्त करता है।
॰ यदि मस्तिष्क रेखा अंत में द्विशाखायुक्त हो जाए तथा एक शाखा ह्रदय रेखा को काटती हुई बुध क्षेत्र तक जाए तथा दूसरी शाखा चन्द्र पर्वत तक जाए तो जातक अत्यन्त चालाक एवं व्यापार से धन अर्जन करने वाला होता है।
॰ यदि मस्तिष्क रेखा से कोई शाखा निकलकर गुरु पर्वत तक जाए और उसके अंत पर क्रॉस का चिह्न हो अथवा कोई आड़ी रेखा हो तो ऐसे जातक को धन अर्जन में सफलता प्राप्त नहीं होती किन्तु उपरोक्त लक्षण के साथ ही यदि मणिबंध पर भी क्रॉस का चिह्न हो तो ऐसे जातक को धन प्राप्ति के संकेत हैं।
॰ यदि हथेली में दो मस्तिष्क रेखा चन्द्र पर्वत के ऊपर की ओर जाकर द्विशाखायुक्त हो जाए तो ऐसा जातक लेखन, प्रकाशन एवं वैज्ञानिक कार्यों के द्वारा धन अर्जन कर सकता है।
॰ यदि शुक्र पर्वत से रेखाएं निकलकर जीवन रेखा तथा मस्तिष्क रेखा दोनों को काटे तो ऐसे जातक पारिवारिक स्थिति में आर्थिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।
॰ यदि हृदय रेखा का उद्गम मध्यमा और तर्जनी अंगुलियों के मध्य भाग से प्रारम्भ होता हो तो ऐसे जातक को कठिन परिश्रमोपरान्त धन प्राप्त होता है।
॰ यदि हृदय रेखा बुध पर्वत को नीचे की ओर से अर्द्धवृत की भाँति घेर ले ऐसा जातक ज्योतिष, योग अथवा दर्शन के द्वारा धनार्जन करता है।
॰ हथेली में यदि दोहरी हृदय रेखा हो तथा शनि क्षेत्र पर क्रॉस का चिह्न हो तो संभव है जातक अनैतिक कार्यों से धन अर्जन करे।
॰ यदि भाग्य रेखा का उद्गम चन्द्र पर्वत से हो तो ऐसा जातक स्त्री के सहयोग से अपना भाग्योदय करता है।
॰ यदि यदि अनामिका तथा मध्यमा अंगुलियाँ बराबर हो तथा सूर्य रेखा पर द्वीप चिह्न हो तो संभव है ऐसा जातक सटोरिया हो।
॰ जीवन रेखा और मस्तिष्क रेखा में अधिक अंतर हो तो ऐसा जातक बिना सोचे-समझे सट्टे लगाए अथवा व्यापारिक कार्य करे तो धनहानि की संभावना रहती है।
॰ सूर्य रेखा से कोई शाखा निकलकर गुरु पर्वत तक जाए और रेखा के अंत में गुरु पर्वत पर तारे का चिह्न हो तो जातक के उच्चपद पर आसीन होने के योग होते हैं।
॰ यदि सूर्य रेखा से कोई छोटी रेखा निकलकर बुधक्षेत्र तक जाए तथा कनिष्ठिका का प्रथम पर्व लम्बा हो तो लेखन, प्रकाशन द्वारा अपनी आजीविका अर्जित करता है।
॰ यदि कनिष्ठिका का दूसरा पर्व लम्बा हो एवं बुध पर्वत पर कोई खड़ी रेखाएं हो तो ऐसा जातक चिकित्सा के क्षेत्र से धनार्जन करता है।
॰ यदि कनिष्ठिका का तीसरा पर्व लम्बा हो तो जातक के धनोपार्जन में सफलता के योग होते हैं।
गोवर्धन पर्वत धारण करने पर नीचे की भुमि जलमग्न क्यों नहीं हुई?
April 24, 2009 – 10:05 pm
गोवर्धन पर्वत धारण करने पर नीचे की भुमि जलमग्न क्यों नहीं हुई?
एक समय शिवजी ने पार्वती जी के सामने सन्तों की बड़ी महिमा गाई। सन्तों की महिमा सुनकर पार्वती जी की श्रद्धा उमड़ी और उसी दिन उन्होंने श्री अगस्त्य मुनि को भोजन का निमन्त्रण दे डाला तथा शिवजी को बाद में इस बाबत बतलाया तो सुनकर शिवजी हंसे और कहा “आज ही तो सन्तों में श्रद्धा हुई और आज ही ऐसे सन्त को न्यौता दे दिया। अगर किसी को भोजन कराना ही था, तो किसी कम भोजन करने वाले मुनि को ही न्यौता दे देती। तुम अगस्त्य को नहीं जानती तीन चुल्लू में समुद्र सोख गए थे। भला इनका पेट भरना कोई हंसी खेल है। यदि भुखे रह गए तो लोक में बड़ी निन्दा होगी। जीवन में एक बार शिव के यहाँ गए और भूखे ही लौटे। भद्रे! कार्य विचार कर नहीं किया।” पार्वती जी बोलीं-”अब तो न्यौता दे ही दिया उसमें उलट-फेर होने की नहीं, चाहे जो भी हो।”
शिवजी बोले-”तो तुम जानो तुम्हारा काम जाने, मैं तो चुपचाप राम-राम जपूँगा।” पार्वती जी तो साक्षात् अन्नपूर्णा ठहरी उन्होनें सोचा जब मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को पूर्ण भोजन करा देती हूँ, तो एक ऋषि का पेट नहीं भर सकती। अवश्य तृप्त ही नहीं महातृप्त करके भेजूँगी। फिर क्या था, बड़े जोर-शोर से तैयारी हुई। खाद्यान्नों के पहाड़ लग गए। आखिर कितना खायेंगे ऋषि।
जब अगस्त्य जी खाने को बैठे तो भोजन का कोई हिसाब ही नही। आखिर परोसने वाली साक्षात् अन्नपूर्णा, इतना मधुर और इतना स्वादिष्ट भोजन। पार्वती जी अपनी समस्त सखियों-सहेलियों सहित दौड़-दौड़कर परोसती रहीं कि भोजन का तारतम्य न टूटे। टोकरी की टोकरी थाल में पलट दी जाती थी, किन्तु इधर यह भी खूब रही कि क्षणभर में थाली साफ। खाते-खाते जब अगस्त्य जी की जठराग्नि धधकी तो उन्हें भोजन को हाथ से उठा-उठाकर ग्रास-ग्रास खाने की जरुरत ही नहीं रही। भोजन स्वयं खिंचकर उनके मुँह मे जाने लगा। परोसने वाली सखियां घबरायी कि कहीं भोजन के साथ हम सब भी न खिंची चली जायें।
ऋषि जी का ढ़ंग देखकर माता अन्नपूर्णा भी अचम्भे में पड़ गई। सोचने लगी अब तो भगवान् ही मर्यादा रखेंगे। ठीक कहा था शम्भूजी ने, किन्तु साथ ही पार्वती को शिव पर झुंझलाहट भी हो रही थी कि देखो तो, मैं तो हैरान हूँ। ऐसे समय पर मेरी सहायता के बजाय मुँह फेरे बैठे हैं। निरुपाय अन्नपूर्णा ने भगवान का द्वार खटखटाया। ठीक भी है ‘हारे को हरिनाम’ प्रसिद्ध ही है।
भगवान तुरन्त ही बाल ब्रह्मचारी का रुप धारणकर आ पहुँचे और बोले-”भगवती भिक्षां देही।” पार्वती जी घबरायी “मैं तो एक ही को पूर्ण करने में परेशान हूँ। ये दूसरे समाज सेवक भी आ धमके, सो भी भूखे ही।” परन्तु धर्म से विवश होकर ब्रह्मचारी जी के लिए भी ऋषि के समीप ही आसन लगाया जाने लगा। अगस्त्य जी अपने समीप आसन नहीं लगाने देते थे, किन्तु ब्रह्मचारी भी पूरे जिद्दी थे। अड़ गये कि बैठूंगा तो यहीं। हारकर अगस्त्य जी चुप हो गए। बाल ब्रह्मचारी जी ने थोड़ा सा भोजन पाकर ही आचमन कर लिया। माता पार्वती ने पूछा-”प्रभो! इतनी जल्दी खाना क्यों बन्द कर दिया?” वे बोले-”हम ब्रह्मचारी हैं अधिक खाने से आलस्य प्रमाद आता है, जिससे भजन में बाधा होती है और क्या हम इनकी तरह भूखे थोड़े ही हैं, कि पूर्ण ही न हों।” उधर अगस्त्य जी ने भी संकोच के कारण खाना बन्द कर दिया, कि पंगत में एक खाता रहे और दूसरा आचमन कर ले। दूसरी बात यह कि जो बाद में आया वह पहले खा चुका। खाना तो बन्द कर दिया, किन्तु अगस्त्य जी ने जल नहीं पिया था। वह ब्रह्मचारी पर बिगड़े-”तुमने मुझे जल नहीं पीने दिया।” भगवान ने कृपा करके अपने स्वरुप के दर्शन कराए और कहा-”आप धैर्य धरें। आपको जल मैं द्वापर में पिलाऊँगा। निमन्त्रण मैं आज ही देता हूँ।”
जब इन्द्र ने अपने लिए होने वाले यज्ञ के बन्द होने पर ब्रज डुबोने के लिए अतिवृष्टि की थी तब भगवान ने उस जल का शोषण करने कि लिए अगस्त्य ऋषि को नियुक्त किया था। इस कारण नीचे की जमीन जलमग्न नहीं होने पायी।
शंकराचार्य परम्परा
April 19, 2009 – 2:01 pm
शंकराचार्य परम्परा
आद्यगुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म के कल्याणार्थ सम्पूर्ण भारत में पृथक्-पृथक् दिशाओं में चार मठों की स्थापना की। ये मठ हैं-
१॰ वेदान्त ज्ञानमठ, श्रृंगेरी (दक्षिण भारत)
२॰ गोवर्धन मठ, जगन्नाथपुरी (पूर्वी भारत)
३॰ शारदा (कालिका) मठ, द्वारका (पश्चिम भारत)
४॰ ज्योतिर्पीठ, बद्रिकाश्रम (उत्तर भारत)
शंकराचार्य जी ने इन मठों की स्थापना के साथ-साथ उनके मठाधीशों की भी नियुक्ति की, जो बाद में स्वयं शंकराचार्य कहलाये। प्रत्येक मठ के शंकराचार्य से गुरु-शिष्य परम्परा विकसित हुई और उसी परम्परा से मठाधीश कालान्तर में नियुक्त होते गए। वे भी शंकराचार्य के नाम से जाने गए।
श्रृंगेरी मठ
श्रृंगेरी मठ भारत के दक्षिण भाग में रामेश्वरम् में स्थित है। इस मठ के अन्तर्गत संन्यासियों के सरस्वती, भारती तथा पुरी सम्प्रदाय आते हैं। इस मठ का महावाक्य “अहं ब्रह्मास्मि” है तथा मठ के अन्तर्गत यजुर्वेद आता है। इस मठ ले प्रथम मठाधीश आचार्य सुरेश्वर ही थे, जिनका पूर्व में नाम मण्डन मिश्र था। सर्वप्रथम शंकराचार्य जी ने इसी मठ की स्थापना की थी। वर्तमान में इस मठ पर भारती तीर्थस्वामी विराजमान हैं। श्रृंगेरी मठ की शंकराचार्य परम्परा क्रमानुसार निम्नलिखित हैः
१॰ आद्यगुरु शंकराचार्य, २॰ सुरेश्वराचार्य, ३॰ नित्यबोध धनाचार्य, ४॰ ज्ञानधनाचार्य, ५॰ ज्ञानोत्तमाचार्य, ६॰ ज्ञानगिर्याचार्य, ७॰ सिंह गिर्याचार्य, ८॰ ईश्वरतीर्थ, ९॰ नरसिंहतीर्थ, १०॰ विद्याशेखरतीर्थ, ११॰ भारतीकृष्णतीर्थ, १२॰ विद्यारण्य, १३॰ चन्द्रशेखर भारती-१, १४॰ नरसिंह भारती-१, १५॰ चन्द्रशेखर भारती-२, १६॰ पुरुषोत्तम भारती-१, १७॰ शंकरानन्द भारती, १८॰ चन्द्रशेखर भारती-३, १९॰ नरसिंह भारती-२, २०॰ पुरुषोत्तम भारती-२, २१॰ रामचन्द्र भारती, २२॰ नरसिंह भारती-३, २३॰ नरसिंह भारती-४, २४॰ अभिनव नरसिंह भारती-१, २५॰ सच्चिदानन्द भारती-१, २६॰ नरसिंह भारती-५, २७॰ सच्चिदानन्द भारती-२, २८॰ अभिनव सच्चिदानन्द भारती-१, २९॰ अभिनव नरसिंह भारती-२, ३०॰ सच्चिदानन्द भारती-३, ३१॰ अभिनव सच्चिदानन्द भारती-२, ३२॰ नरसिंह भारती-६, ३३॰ सच्चिदानन्द शिवाभिनव नरसिंह भारती, ३४॰ चन्द्रशेखर भारती-४, ३५॰ अभिनव विद्यातीर्थ, ३६॰ भारती कृष्णतीर्थ।
गोवर्धन मठ
गोवर्धन मठ भारत के पूर्वी भाग में उड़ीसा राज्य के पुरी नगर में स्थित है। इस मठ के प्रथम मठाधीश आद्य शंकराचार्य के प्रथम शिष्य पद्मपाद हुए। इस मठ के अन्तर्गत आरण्य सम्प्रदाय को रखा गया। इसके अवलम्बन के लिए ऋग्वेद को प्रमुखता प्रदान की गई तथा “प्रज्ञानं ब्रह्म” नामक महावाक्य प्रदान किया है। श्रृंगेरी मठ के पश्चात् शंकराचार्य जी ने इस मठ की स्थापना की थी।
वर्तमान में श्री निश्चलानन्द जी इस मठ के मठाधीश हैः
१॰ पद्मपाद, २॰ शूलपाणि, ३॰ नारायण, ४॰ विद्यारण्य, ५॰ वामदेव, ६॰ पद्मनाभ, ७॰ जगन्नाथ, ८॰ मधुरेश्वर, ९॰ गोविन्द, १०॰ श्रीधर, ११॰ माधवानन्द, १२॰ कृष्णा ब्रह्मानन्द, १३॰ रामानन्द, १४॰ वागीश्वर, १५॰ परमेश्वर, १६॰ श्री गोपाल, १७॰ जनार्दन, १८॰ ज्ञानान्द, १९॰ वृहदारण्य, २०॰ महादेव, २१॰ परमब्रह्मानंद, २२॰ रामानंद, २३॰ सदाशिव, २४॰ हरीश्वरानंद, २५॰ बोधानन्द, २६॰ रामकृष्ण, २७॰ चिद्बोधात्म, २८॰ तत्त्वक्षवर, २९॰ शंकर, ३०॰ वासुदेव, ३१॰ हयग्रीव, ३२॰ स्मृतीश्वर, ३३॰ विद्यानंद, ३४॰ मुकुन्दानंद, ३५॰ हिरण्यगर्भ, ३६॰ नित्यानंद, ३७॰ शिवानंद, ३८॰ योगीश्वर, ३९॰ सुदर्शन, ४०॰ व्योमकेश, ४१॰ दामोदर, ४२॰ योगानंद, ४३॰ गोलकेश, ४४॰ कृष्णानंद, ४५॰ देवानंद, ४६॰ चंद्रचूड, ४७॰ हलायुध, ४८॰ सिद्धसेव्य, ४९॰ तारकात्मा, ५०॰ बोधायन, ५१॰ श्रीधर, ५२॰ नारायण, ५३॰ सदाशिव, ५५॰ विरुपाक्ष, ५६॰ विद्यारण्य, ५७॰ विशेश्वर, ५८॰ विबुधेश्वर, ५९॰ महेश्वर, ६०॰ मधुसूदन, ६१॰ रघूत्तम, ६२॰ रामचन्द्र, ६३॰ योगीन्द्र, ६४॰ महेश्वर, ६५॰ ओंकार, ६६॰ नारायण, ६७॰ जगन्नाथ, ६८॰ श्रीधर, ६९॰ रामचन्द्र, ७०॰ ताम्राक्ष, ७१॰ उग्रेश्वर, ७२॰ उद्दण्ड, ७३॰ सकर्षण, ७४॰ जनार्दन, ७५॰ अखण्डात्मा, ७६॰ दामोदर, ७७॰ शिवानंद, ७८॰ गदाधर, ७९॰ विद्याधर, ८०॰ वामन, ८१॰ शंकर, ८२॰ नीलकंठ, ८३॰ रामकृष्ण, ८४॰ रघूत्तम, ८५॰ दामोदर, ८६॰ गोपाल, ८७॰ मृत्युंजय, ८८॰ गोविन्द, ८९॰ वासुदेव, ९०॰ गंगाधर, ९१॰ सदाशिव, ९२॰ वामदेव, ९३॰ उपमन्यु, ९४॰ हयग्रीव, ९५॰ हरि, ९६॰ रघूत्तम, ९७॰ पुण्डरीकाक्ष, ९८॰ पराशंकर तीर्थ, ९९॰ वेदगर्भ, १००॰ वेदान्त भास्कर, १०१॰ विज्ञानात्मा, १०२॰ शिवानंद, १०३॰ महेश्वर, १०४॰ रामकृष्ण, १०५॰ वृषध्वज, १०६॰ शिद्धबोध, १०७॰ सोमेश्वर, १०८॰ गोपदेव, १०९॰ शंभुतीर्थ, ११०॰ भृगु, १११॰ केशवानंद, ११२॰ विद्यानंद, ११३॰ वेदानंद, ११४॰ बोधानंद, ११५॰ सुतपानंद, ११६॰ श्रीधर, ११७॰ जनार्दन, ११८॰ कामनाशनानंद, ११९॰ हरिहरानंद, १२०॰ गोपाल, १२१॰ कृष्णानंद, १२२॰ माधवानंद, १२३॰ मधुसूदन, १२४॰ गोविन्द, १२५॰ रघूत्तम, १२६॰ वामदेव, १२७॰ हृषीकेश, १२८॰ दामोदर, १२९॰ गोपालानंद, १३०॰ गोविन्द, १३१॰ रघुनाथ, १३२॰ रामचन्द्र, १३३॰ गोविन्द, १३४॰ रघुनाथ, १३५॰ रामकृष्ण, १३६॰ मधुसूदन, १३७॰ दामोदर, १३८॰ रघूत्तम, १३९॰ शिव, १४०॰ लोकनाथ, १४१॰ दामोदर, १४२॰ मधुसूदन तीर्थ, १४३॰ भारती कृष्ण तीर्थ, १४४॰ निरंजनदेव तीर्थ, १४५॰ निश्चलानंद सरस्वती।
शारदा मठ
शारदा (कालिका) मठ गुजरात में द्वारकाधाम में स्थित है। इस मठ के अन्तर्गत ‘तीर्थ’ और ‘आश्रम” सम्प्रदाय आते हैं। इसमें सामवेद की प्रमुखता है तथा महावाक्य “तत्त्वमसि” है। शारदा मठ के प्रथम मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे। हस्तामलक शंकराचार्य जी के प्रमुख चार शिष्यों में से एक थे। गोवर्धन मठ के पश्चात् शारदा मठ की स्थापना की गई।
१॰ हस्तामलक, २॰ ब्रह्मस्वरुपाचार्य, ३॰ चित्सुखाचार्य, ४॰ सर्वज्ञानाचार्य, ५॰ ब्रह्मानन्द तीर्थ, ६॰ स्वरुपाविज्ञानाचार्य, ७॰ मंगलमूर्त्याचार्य, ८॰ भास्कराचार्य, ९॰ प्रज्ञानाचार्य, १०॰ ब्रह्मज्योत्स्नाचार्य, ११॰ आनंदवीर भावाचार्य, १२॰ कलानिधि तीर्थ, १३॰ चिद्विलासाचार्य, १४॰ विभूत्यानन्दचार्य, १५॰ स्फूर्तिनिलय पाद, १६॰ वरतन्तुपाद, १७॰ योगरुढ़ाचार्य, १८॰ विज्ञानडिण्डिमाचार्य, १९॰ विद्यातीर्थ, २०॰ चिच्छक्तिदाचार्य, २१॰ विज्ञानेश्वरतीर्थ, २२॰ ऋतम्भराचार्य, २३॰ अमरेश्वरगुरु, २४॰ सर्वमुखतीर्थ, २५॰ स्वानन्ददेशिक, २६॰ समररसिक, २७॰ नारायणाश्रम, २८॰ वैकुण्ठाश्रम, २९॰ त्रिविक्रमाश्रम, ३०॰ शशिशेखराश्रम, ३१॰ त्रयम्बकाश्रम, ३२॰ चिदम्बराश्रम, ३३॰ केशवाश्रम, ३४॰ चिदम्बराश्रम, ३५॰ पद्मनाभाश्रम, ३६॰ महादेवाश्रम, ३७॰ सच्चिदानन्दाश्रम, ३८॰ विद्याशंकराश्रम, ३९॰ अभिनव सच्चिदानन्दाश्रम, ४०॰ नृसिंहाश्रम, ४१॰ वासुदेवाश्रम, ४२॰ पुरुषोत्तमाश्रम, ४३॰ ज्ञानार्धनाश्रम, ४४॰ हरिहराश्रम, ४५॰ भावाश्रम, ४६॰ ब्रह्माश्रम, ४७॰ वसनाश्रम, ४८॰ सर्वज्ञानाश्रम, ४९॰ प्रद्युम्नाश्रम, ५०॰ गोविन्दाश्रम, ५१॰ चिदाश्रम, ५२॰ विश्वेश्वराश्रम, ५३॰ दामोदराश्रम, ५४॰ महादेवाश्रम, ५५॰ अनिरुद्धाश्रम, ५६॰ अच्युताश्रम, ५७॰ माधवाश्रम, ५८॰ आनन्दाश्रम, ५९॰ विश्वरुपाश्रम, ६०॰ चिद्घनाश्रम, ६१॰ नृसिंहाश्रम, ६२॰ मनोहराश्रम, ६३॰ प्रकाशानन्द सरस्वती, ६४॰ विशुद्धानन्दाश्रम, ६५॰ वामनेश, ६६॰ केशवाश्रम, ६७॰ मधुसूदनाश्रम, ६८॰ हयग्रीवाश्रम, ६९॰ प्रकाशाश्रम, ७०॰ हयग्रीवाश्रम सरस्वती, ७१॰ धराश्रम, ७२॰ दामोदराश्रम, ७३॰ केशवाशरम, ७४॰ राजराजेश्वरशंकराश्रम, ७५॰ माधव तीर्थ, ७६॰ शान्तानन्द, ७७॰ चन्द्र शेखराश्रम, ७८॰ अभिनव सच्चिदानन्दाश्रम, ७९॰ स्वामी स्वरुपानन्द सरस्वती।
ज्योतिर्मठ
ज्योतिर्मठ उत्तरांचल में बद्रिकाश्रम में स्थित है। इस मठ के अन्तर्गत ‘गिरि’, ‘पर्वत’ एवं ‘सागर’ नामक संन्यासी सम्प्रदाय आते हैं। इस मठ का महावाक्य ‘अयमात्मा ब्रह्म” है। इस मठ से सम्बन्धित वेद अथर्ववेद है। ज्योतिर्मठ के प्रथम मठाधीश आचार्य तोटक बनाए गए।
१॰ तोटकाचार्य, २॰ विजय, ३॰ कृष्ण, ४॰ कुमार, ५॰ गरुड, ६॰ शुक्र, ७॰ विन्ध्य, ८॰ विशाल, ९॰ बकुल, १०॰ वामन, ११॰ सुन्दर, १२॰ अरुण, १३॰ निवास, १४॰ आनन्द (सुखानन्द), १५॰ विद्यानन्द, १६॰ शिव, १७॰ गिरि, १८॰ विद्याधर, १९॰ गुणानन्द, २०॰ नारायण, २१॰ उमापति, २२॰ बालकृष्णस्वामी, २३॰ हरिब्रह्म स्वामी, २४॰ हरिस्मरण, २५॰ वृन्दावन स्वामी, २६॰ अनन्त नारायण, २७॰ भवानन्द, २८॰ कृष्णानन्द स्वामी, २९॰ हरिनारायण, ३०॰ ब्रह्मानन्द, ३१॰ देवानन्द, ३२॰ रघुनाथ, ३३॰ पूर्णदेव, ३४॰ कृष्णदेव, ३५॰ शिवानन्द, ३६॰ बालकृष्ण, ३७॰ नारायण उपेन्द्र, ३८॰ हरिश्चन्द्र, ३९॰ सदानन्द, ४०॰ केशवानन्द, ४१॰ नारायणतीर्थ, ४२॰ रामकृष्णतीर्थ, ४३॰ ब्रह्मानन्द सरस्वती, ४४॰ कृष्णबोधाश्रम।
काँची मठ
काँची मठ को भी आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठ के रुप में माना जाता है, किन्तु यह विवादास्पद है। काँची मठ की परम्परा में माना जाता है कि आद्य गुरु शंकराचार्य ने इस मठ की स्थापना की थी और यहीं उन्होंने अपना शरीर त्यागा था। वर्तमान में जयेन्द्र सरस्वती काँची मठ के मठाधीश्वर हैं। वे इस परम्परा के ६९ वें मठाधीश्वरहैं।



