Monthly Archives: July 2008

स्वस्ति-वाचन

स्वस्ति-वाचन
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः । 
देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे-दिवे ॥ 
देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम् । 
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ॥ 
तान् पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम् । 
अर्यमणं वरुणं सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत् ॥ 
तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता [...]

वेद के सूक्तों का तात्त्विक रहस्य

वेद के सूक्तों का तात्त्विक रहस्य
‘सूक्त’ शब्द ‘सु’ उपसर्गपूर्वक ‘वच्’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करने पर व्याकृत होता है। ‘सूक्त’ शब्द का अभिप्राय है- ‘अच्छी रीति से कहा हुआ’। जो वेदमन्त्र समूह एकदैवत्य और एकार्थ-प्रतिपादक हो, उसे ‘सूक्त’ कहा जाता है। बृहद्देवता में सूक्त शब्द का निर्वचन इस प्रकार किया गया है-’सम्पूर्णं ऋषिवाक्यं तु सूक्तामित्यभिधीयते’ [...]

वेदों का विभाजन

वेदों का विभाजन
आधुनिक विचारधारा के अनुसार चारों वेदों की शब्द-राशि के विस्तार में तीन दृष्टियाँ पायी जाती है- (१) याज्ञिक, (२) प्रायोगिक और (३) साहित्यिक दृष्टि।
याज्ञिक दृष्टिः- इसके अनुसार वेदोक्त यज्ञों का अनुष्ठान ही वेद के शब्दों का मुख्य उपयोग माना गया है। सृष्टि के आरम्भ से ही यज्ञ करने में साधारणतया मन्त्रोच्चारण की शैली, [...]

वैदिक वाङ्मय का शास्त्रीय स्वरुप

वैदिक वाङ्मय का शास्त्रीय स्वरुप
वर्तमान काल में वेद चार माने जाते हैं। उनके नाम हैं-
(१) ऋग्वेद, (२) यजुर्वेद, (३) सामवेद तथा (४) अथर्ववेद। 
द्वापरयुग की समाप्ति के पूर्व वेदों के उक्त चार विभाग अलग-अलग नहीं थे। उस समय तो ऋक्, यजुः और साम – इन तीन शब्द-शैलियों की संग्रहात्मक एक विशिष्ट अध्ययनीय शब्द-राशि ही वेद कहलाती [...]