गोवर्धन पर्वत धारण करने पर नीचे की भुमि जलमग्न क्यों नहीं हुई?

गोवर्धन पर्वत धारण करने पर नीचे की भुमि जलमग्न क्यों नहीं हुई?
एक समय शिवजी ने पार्वती जी के सामने सन्तों की बड़ी महिमा गाई। सन्तों की महिमा सुनकर पार्वती जी की श्रद्धा उमड़ी और उसी दिन उन्होंने श्री अगस्त्य मुनि को भोजन का निमन्त्रण दे डाला तथा शिवजी को बाद में इस बाबत बतलाया तो सुनकर शिवजी हंसे और कहा “आज ही तो सन्तों में श्रद्धा हुई और आज ही ऐसे सन्त को न्यौता दे दिया। अगर किसी को भोजन कराना ही था, तो किसी कम भोजन करने वाले मुनि को ही न्यौता दे देती। तुम अगस्त्य को नहीं जानती तीन चुल्लू में समुद्र सोख गए थे। भला इनका पेट भरना कोई हंसी खेल है। यदि भुखे रह गए तो लोक में बड़ी निन्दा होगी। जीवन में एक बार शिव के यहाँ गए और भूखे ही लौटे। भद्रे! कार्य विचार कर नहीं किया।” पार्वती जी बोलीं-”अब तो न्यौता दे ही दिया उसमें उलट-फेर होने की नहीं, चाहे जो भी हो।”
शिवजी बोले-”तो तुम जानो तुम्हारा काम जाने, मैं तो चुपचाप राम-राम जपूँगा।” पार्वती जी तो साक्षात् अन्नपूर्णा ठहरी उन्होनें सोचा जब मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को पूर्ण भोजन करा देती हूँ, तो एक ऋषि का पेट नहीं भर सकती। अवश्य तृप्त ही नहीं महातृप्त करके भेजूँगी। फिर क्या था, बड़े जोर-शोर से तैयारी हुई। खाद्यान्नों के पहाड़ लग गए। आखिर कितना खायेंगे ऋषि।
जब अगस्त्य जी खाने को बैठे तो भोजन का कोई हिसाब ही नही। आखिर परोसने वाली साक्षात् अन्नपूर्णा, इतना मधुर और इतना स्वादिष्ट भोजन। पार्वती जी अपनी समस्त सखियों-सहेलियों सहित दौड़-दौड़कर परोसती रहीं कि भोजन का तारतम्य न टूटे। टोकरी की टोकरी थाल में पलट दी जाती थी, किन्तु इधर यह भी खूब रही कि क्षणभर में थाली साफ। खाते-खाते जब अगस्त्य जी की जठराग्नि धधकी तो उन्हें भोजन को हाथ से उठा-उठाकर ग्रास-ग्रास खाने की जरुरत ही नहीं रही। भोजन स्वयं खिंचकर उनके मुँह मे जाने लगा। परोसने वाली सखियां घबरायी कि कहीं भोजन के साथ हम सब भी न खिंची चली जायें।
ऋषि जी का ढ़ंग देखकर माता अन्नपूर्णा भी अचम्भे में पड़ गई। सोचने लगी अब तो भगवान् ही मर्यादा रखेंगे। ठीक कहा था शम्भूजी ने, किन्तु साथ ही पार्वती को शिव पर झुंझलाहट भी हो रही थी कि देखो तो, मैं तो हैरान हूँ। ऐसे समय पर मेरी सहायता के बजाय मुँह फेरे बैठे हैं। निरुपाय अन्नपूर्णा ने भगवान का द्वार खटखटाया। ठीक भी है ‘हारे को हरिनाम’ प्रसिद्ध ही है।
भगवान तुरन्त ही बाल ब्रह्मचारी का रुप धारणकर आ पहुँचे और बोले-”भगवती भिक्षां देही।” पार्वती जी घबरायी “मैं तो एक ही को पूर्ण करने में परेशान हूँ। ये दूसरे समाज सेवक भी आ धमके, सो भी भूखे ही।” परन्तु धर्म से विवश होकर ब्रह्मचारी जी के लिए भी ऋषि के समीप ही आसन लगाया जाने लगा। अगस्त्य जी अपने समीप आसन नहीं लगाने देते थे, किन्तु ब्रह्मचारी भी पूरे जिद्दी थे। अड़ गये कि बैठूंगा तो यहीं। हारकर अगस्त्य जी चुप हो गए। बाल ब्रह्मचारी जी ने थोड़ा सा भोजन पाकर ही आचमन कर लिया। माता पार्वती ने पूछा-”प्रभो! इतनी जल्दी खाना क्यों बन्द कर दिया?” वे बोले-”हम ब्रह्मचारी हैं अधिक खाने से आलस्य प्रमाद आता है, जिससे भजन में बाधा होती है और क्या हम इनकी तरह भूखे थोड़े ही हैं, कि पूर्ण ही न हों।” उधर अगस्त्य जी ने भी संकोच के कारण खाना बन्द कर दिया, कि पंगत में एक खाता रहे और दूसरा आचमन कर ले। दूसरी बात यह कि जो बाद में आया वह पहले खा चुका। खाना तो बन्द कर दिया, किन्तु अगस्त्य जी ने जल नहीं पिया था। वह ब्रह्मचारी पर बिगड़े-”तुमने मुझे जल नहीं पीने दिया।” भगवान ने कृपा करके अपने स्वरुप के दर्शन कराए और कहा-”आप धैर्य धरें। आपको जल मैं द्वापर में पिलाऊँगा। निमन्त्रण मैं आज ही देता हूँ।”
जब इन्द्र ने अपने लिए होने वाले यज्ञ के बन्द होने पर ब्रज डुबोने के लिए अतिवृष्टि की थी तब भगवान ने उस जल का शोषण करने कि लिए अगस्त्य ऋषि को नियुक्त किया था। इस कारण नीचे की जमीन जलमग्न नहीं होने पायी।

शंकराचार्य परम्परा

शंकराचार्य परम्परा
आद्यगुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म के कल्याणार्थ सम्पूर्ण भारत में पृथक्-पृथक् दिशाओं में चार मठों की स्थापना की। ये मठ हैं-
१॰ वेदान्त ज्ञानमठ, श्रृंगेरी (दक्षिण भारत)
२॰ गोवर्धन मठ, जगन्नाथपुरी (पूर्वी भारत)
३॰ शारदा (कालिका) मठ, द्वारका (पश्चिम भारत)
४॰ ज्योतिर्पीठ, बद्रिकाश्रम (उत्तर भारत)
शंकराचार्य जी ने इन मठों की स्थापना के साथ-साथ उनके मठाधीशों की भी नियुक्ति की, जो बाद में स्वयं शंकराचार्य कहलाये। प्रत्येक मठ के शंकराचार्य से गुरु-शिष्य परम्परा विकसित हुई और उसी परम्परा से मठाधीश कालान्तर में नियुक्त होते गए। वे भी शंकराचार्य के नाम से जाने गए।
श्रृंगेरी मठ
श्रृंगेरी मठ भारत के दक्षिण भाग में रामेश्वरम् में स्थित है। इस मठ के अन्तर्गत संन्यासियों के सरस्वती, भारती तथा पुरी सम्प्रदाय आते हैं। इस मठ का महावाक्य “अहं ब्रह्मास्मि” है तथा मठ के अन्तर्गत यजुर्वेद आता है। इस मठ ले प्रथम मठाधीश आचार्य सुरेश्वर ही थे, जिनका पूर्व में नाम मण्डन मिश्र था। सर्वप्रथम शंकराचार्य जी ने इसी मठ की स्थापना की थी। वर्तमान में इस मठ पर भारती तीर्थस्वामी विराजमान हैं। श्रृंगेरी मठ की शंकराचार्य परम्परा क्रमानुसार निम्नलिखित हैः
१॰ आद्यगुरु शंकराचार्य, २॰ सुरेश्वराचार्य, ३॰ नित्यबोध धनाचार्य, ४॰ ज्ञानधनाचार्य, ५॰ ज्ञानोत्तमाचार्य, ६॰ ज्ञानगिर्याचार्य, ७॰ सिंह गिर्याचार्य, ८॰ ईश्वरतीर्थ, ९॰ नरसिंहतीर्थ, १०॰ विद्याशेखरतीर्थ, ११॰ भारतीकृष्णतीर्थ, १२॰ विद्यारण्य, १३॰ चन्द्रशेखर भारती-१, १४॰ नरसिंह भारती-१, १५॰ चन्द्रशेखर भारती-२, १६॰ पुरुषोत्तम भारती-१, १७॰ शंकरानन्द भारती, १८॰ चन्द्रशेखर भारती-३, १९॰ नरसिंह भारती-२, २०॰ पुरुषोत्तम भारती-२, २१॰ रामचन्द्र भारती, २२॰ नरसिंह भारती-३, २३॰ नरसिंह भारती-४, २४॰ अभिनव नरसिंह भारती-१, २५॰ सच्चिदानन्द भारती-१, २६॰ नरसिंह भारती-५, २७॰ सच्चिदानन्द भारती-२, २८॰ अभिनव सच्चिदानन्द भारती-१, २९॰ अभिनव नरसिंह भारती-२, ३०॰ सच्चिदानन्द भारती-३, ३१॰ अभिनव सच्चिदानन्द भारती-२, ३२॰ नरसिंह भारती-६, ३३॰ सच्चिदानन्द शिवाभिनव नरसिंह भारती, ३४॰ चन्द्रशेखर भारती-४, ३५॰ अभिनव विद्यातीर्थ, ३६॰ भारती कृष्णतीर्थ।

गोवर्धन मठ
गोवर्धन मठ भारत के पूर्वी भाग में उड़ीसा राज्य के पुरी नगर में स्थित है। इस मठ के प्रथम मठाधीश आद्य शंकराचार्य के प्रथम शिष्य पद्मपाद हुए। इस मठ के अन्तर्गत आरण्य सम्प्रदाय को रखा गया। इसके अवलम्बन के लिए ऋग्वेद को प्रमुखता प्रदान की गई तथा “प्रज्ञानं ब्रह्म” नामक महावाक्य प्रदान किया है। श्रृंगेरी मठ के पश्चात् शंकराचार्य जी ने इस मठ की स्थापना की थी।
वर्तमान में श्री निश्चलानन्द जी इस मठ के मठाधीश हैः
१॰ पद्मपाद, २॰ शूलपाणि, ३॰ नारायण, ४॰ विद्यारण्य, ५॰ वामदेव, ६॰ पद्मनाभ, ७॰ जगन्नाथ, ८॰ मधुरेश्वर, ९॰ गोविन्द, १०॰ श्रीधर, ११॰ माधवानन्द, १२॰ कृष्णा ब्रह्मानन्द, १३॰ रामानन्द, १४॰ वागीश्वर, १५॰ परमेश्वर, १६॰ श्री गोपाल, १७॰ जनार्दन, १८॰ ज्ञानान्द, १९॰ वृहदारण्य, २०॰ महादेव, २१॰ परमब्रह्मानंद, २२॰ रामानंद, २३॰ सदाशिव, २४॰ हरीश्वरानंद, २५॰ बोधानन्द, २६॰ रामकृष्ण, २७॰ चिद्बोधात्म, २८॰ तत्त्वक्षवर, २९॰ शंकर, ३०॰ वासुदेव, ३१॰ हयग्रीव, ३२॰ स्मृतीश्वर, ३३॰ विद्यानंद, ३४॰ मुकुन्दानंद, ३५॰ हिरण्यगर्भ, ३६॰ नित्यानंद, ३७॰ शिवानंद, ३८॰ योगीश्वर, ३९॰ सुदर्शन, ४०॰ व्योमकेश, ४१॰ दामोदर, ४२॰ योगानंद, ४३॰ गोलकेश, ४४॰ कृष्णानंद, ४५॰ देवानंद, ४६॰ चंद्रचूड, ४७॰ हलायुध, ४८॰ सिद्धसेव्य, ४९॰ तारकात्मा, ५०॰ बोधायन, ५१॰ श्रीधर, ५२॰ नारायण, ५३॰ सदाशिव, ५५॰ विरुपाक्ष, ५६॰ विद्यारण्य, ५७॰ विशेश्वर, ५८॰ विबुधेश्वर, ५९॰ महेश्वर, ६०॰ मधुसूदन, ६१॰ रघूत्तम, ६२॰ रामचन्द्र, ६३॰ योगीन्द्र, ६४॰ महेश्वर, ६५॰ ओंकार, ६६॰ नारायण, ६७॰ जगन्नाथ, ६८॰ श्रीधर, ६९॰ रामचन्द्र, ७०॰ ताम्राक्ष, ७१॰ उग्रेश्वर, ७२॰ उद्दण्ड, ७३॰ सकर्षण, ७४॰ जनार्दन, ७५॰ अखण्डात्मा, ७६॰ दामोदर, ७७॰ शिवानंद, ७८॰ गदाधर, ७९॰ विद्याधर, ८०॰ वामन, ८१॰ शंकर, ८२॰ नीलकंठ, ८३॰ रामकृष्ण, ८४॰ रघूत्तम, ८५॰ दामोदर, ८६॰ गोपाल, ८७॰ मृत्युंजय, ८८॰ गोविन्द, ८९॰ वासुदेव, ९०॰ गंगाधर, ९१॰ सदाशिव, ९२॰ वामदेव, ९३॰ उपमन्यु, ९४॰ हयग्रीव, ९५॰ हरि, ९६॰ रघूत्तम, ९७॰ पुण्डरीकाक्ष, ९८॰ पराशंकर तीर्थ, ९९॰ वेदगर्भ, १००॰ वेदान्त भास्कर, १०१॰ विज्ञानात्मा, १०२॰ शिवानंद, १०३॰ महेश्वर, १०४॰ रामकृष्ण, १०५॰ वृषध्वज, १०६॰ शिद्धबोध, १०७॰ सोमेश्वर, १०८॰ गोपदेव, १०९॰ शंभुतीर्थ, ११०॰ भृगु, १११॰ केशवानंद, ११२॰ विद्यानंद, ११३॰ वेदानंद, ११४॰ बोधानंद, ११५॰ सुतपानंद, ११६॰ श्रीधर, ११७॰ जनार्दन, ११८॰ कामनाशनानंद, ११९॰ हरिहरानंद, १२०॰ गोपाल, १२१॰ कृष्णानंद, १२२॰ माधवानंद, १२३॰ मधुसूदन, १२४॰ गोविन्द, १२५॰ रघूत्तम, १२६॰ वामदेव, १२७॰ हृषीकेश, १२८॰ दामोदर, १२९॰ गोपालानंद, १३०॰ गोविन्द, १३१॰ रघुनाथ, १३२॰ रामचन्द्र, १३३॰ गोविन्द, १३४॰ रघुनाथ, १३५॰ रामकृष्ण, १३६॰ मधुसूदन, १३७॰ दामोदर, १३८॰ रघूत्तम, १३९॰ शिव, १४०॰ लोकनाथ, १४१॰ दामोदर, १४२॰ मधुसूदन तीर्थ, १४३॰ भारती कृष्ण तीर्थ, १४४॰ निरंजनदेव तीर्थ, १४५॰ निश्चलानंद सरस्वती।

शारदा मठ
शारदा (कालिका) मठ गुजरात में द्वारकाधाम में स्थित है। इस मठ के अन्तर्गत ‘तीर्थ’ और ‘आश्रम” सम्प्रदाय आते हैं। इसमें सामवेद की प्रमुखता है तथा महावाक्य “तत्त्वमसि” है। शारदा मठ के प्रथम मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे। हस्तामलक शंकराचार्य जी के प्रमुख चार शिष्यों में से एक थे। गोवर्धन मठ के पश्चात् शारदा मठ की स्थापना की गई।
१॰ हस्तामलक, २॰ ब्रह्मस्वरुपाचार्य, ३॰ चित्सुखाचार्य, ४॰ सर्वज्ञानाचार्य, ५॰ ब्रह्मानन्द तीर्थ, ६॰ स्वरुपाविज्ञानाचार्य, ७॰ मंगलमूर्त्याचार्य, ८॰ भास्कराचार्य, ९॰ प्रज्ञानाचार्य, १०॰ ब्रह्मज्योत्स्नाचार्य, ११॰ आनंदवीर भावाचार्य, १२॰ कलानिधि तीर्थ, १३॰ चिद्विलासाचार्य, १४॰ विभूत्यानन्दचार्य, १५॰ स्फूर्तिनिलय पाद, १६॰ वरतन्तुपाद, १७॰ योगरुढ़ाचार्य, १८॰ विज्ञानडिण्डिमाचार्य, १९॰ विद्यातीर्थ, २०॰ चिच्छक्तिदाचार्य, २१॰ विज्ञानेश्वरतीर्थ, २२॰ ऋतम्भराचार्य, २३॰ अमरेश्वरगुरु, २४॰ सर्वमुखतीर्थ, २५॰ स्वानन्ददेशिक, २६॰ समररसिक, २७॰ नारायणाश्रम, २८॰ वैकुण्ठाश्रम, २९॰ त्रिविक्रमाश्रम, ३०॰ शशिशेखराश्रम, ३१॰ त्रयम्बकाश्रम, ३२॰ चिदम्बराश्रम, ३३॰ केशवाश्रम, ३४॰ चिदम्बराश्रम, ३५॰ पद्मनाभाश्रम, ३६॰ महादेवाश्रम, ३७॰ सच्चिदानन्दाश्रम, ३८॰ विद्याशंकराश्रम, ३९॰ अभिनव सच्चिदानन्दाश्रम, ४०॰ नृसिंहाश्रम, ४१॰ वासुदेवाश्रम, ४२॰ पुरुषोत्तमाश्रम, ४३॰ ज्ञानार्धनाश्रम, ४४॰ हरिहराश्रम, ४५॰ भावाश्रम, ४६॰ ब्रह्माश्रम, ४७॰ वसनाश्रम, ४८॰ सर्वज्ञानाश्रम, ४९॰ प्रद्युम्नाश्रम, ५०॰ गोविन्दाश्रम, ५१॰ चिदाश्रम, ५२॰ विश्वेश्वराश्रम, ५३॰ दामोदराश्रम, ५४॰ महादेवाश्रम, ५५॰ अनिरुद्धाश्रम, ५६॰ अच्युताश्रम, ५७॰ माधवाश्रम, ५८॰ आनन्दाश्रम, ५९॰ विश्वरुपाश्रम, ६०॰ चिद्घनाश्रम, ६१॰ नृसिंहाश्रम, ६२॰ मनोहराश्रम, ६३॰ प्रकाशानन्द सरस्वती, ६४॰ विशुद्धानन्दाश्रम, ६५॰ वामनेश, ६६॰ केशवाश्रम, ६७॰ मधुसूदनाश्रम, ६८॰ हयग्रीवाश्रम, ६९॰ प्रकाशाश्रम, ७०॰ हयग्रीवाश्रम सरस्वती, ७१॰ धराश्रम, ७२॰ दामोदराश्रम, ७३॰ केशवाशरम, ७४॰ राजराजेश्वरशंकराश्रम, ७५॰ माधव तीर्थ, ७६॰ शान्तानन्द, ७७॰ चन्द्र शेखराश्रम, ७८॰ अभिनव सच्चिदानन्दाश्रम, ७९॰ स्वामी स्वरुपानन्द सरस्वती।

ज्योतिर्मठ
ज्योतिर्मठ उत्तरांचल में बद्रिकाश्रम में स्थित है। इस मठ के अन्तर्गत ‘गिरि’, ‘पर्वत’ एवं ‘सागर’ नामक संन्यासी सम्प्रदाय आते हैं। इस मठ का महावाक्य ‘अयमात्मा ब्रह्म” है। इस मठ से सम्बन्धित वेद अथर्ववेद है। ज्योतिर्मठ के प्रथम मठाधीश आचार्य तोटक बनाए गए।
१॰ तोटकाचार्य, २॰ विजय, ३॰ कृष्ण, ४॰ कुमार, ५॰ गरुड, ६॰ शुक्र, ७॰ विन्ध्य, ८॰ विशाल, ९॰ बकुल, १०॰ वामन, ११॰ सुन्दर, १२॰ अरुण, १३॰ निवास, १४॰ आनन्द (सुखानन्द), १५॰ विद्यानन्द, १६॰ शिव, १७॰ गिरि, १८॰ विद्याधर, १९॰ गुणानन्द, २०॰ नारायण, २१॰ उमापति, २२॰ बालकृष्णस्वामी, २३॰ हरिब्रह्म स्वामी, २४॰ हरिस्मरण, २५॰ वृन्दावन स्वामी, २६॰ अनन्त नारायण, २७॰ भवानन्द, २८॰ कृष्णानन्द स्वामी, २९॰ हरिनारायण, ३०॰ ब्रह्मानन्द, ३१॰ देवानन्द, ३२॰ रघुनाथ, ३३॰ पूर्णदेव, ३४॰ कृष्णदेव, ३५॰ शिवानन्द, ३६॰ बालकृष्ण, ३७॰ नारायण उपेन्द्र, ३८॰ हरिश्चन्द्र, ३९॰ सदानन्द, ४०॰ केशवानन्द, ४१॰ नारायणतीर्थ, ४२॰ रामकृष्णतीर्थ, ४३॰ ब्रह्मानन्द सरस्वती, ४४॰ कृष्णबोधाश्रम।

काँची मठ
काँची मठ को भी आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठ के रुप में माना जाता है, किन्तु यह विवादास्पद है। काँची मठ की परम्परा में माना जाता है कि आद्य गुरु शंकराचार्य ने इस मठ की स्थापना की थी और यहीं उन्होंने अपना शरीर त्यागा था। वर्तमान में जयेन्द्र सरस्वती काँची मठ के मठाधीश्वर हैं। वे इस परम्परा के ६९ वें मठाधीश्वरहैं।

सीता स्वयंवर में अयोध्या नरेश को आमंत्रण क्यों नहीं?

सीता स्वयंवर में अयोध्या नरेश को आमंत्रण क्यों नहीं?
राजा जनक के शासनकाल में एक व्यक्ति का विवाह हुआ। जब वह पहली बार सज-सँवरकर ससुराल के लिए चला, तो रास्ते में चलते-चलते एक जगह उसको दलदल मिला, जिसमें एक गाय फँसी हुई थी, जो लगभग मरने के कगार पर थी। उसने विचार किया कि गाय तो कुछ देर में मरने वाली ही है तथा कीचड़ में जाने पर मेरे कपड़े तथा जूते खराब हो जाएँगे, अतः उसने गाय के ऊपर पैर रखकर आगे बढ़ गया। जैसे ही वह आगे बढ़ा गाय ने तुरन्त दम तोड़ दिया तथा शाप दिया कि जिसके लिए तू जा रहा है, उसे देख नहीं पाएगा, वह भी मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी।
वह व्यक्ति अपार दुविधा में फँस गया और गौ-शाप से मुक्त होने का विचार करने लगा। ससुराल पहुँचकर वह दरवाजे के बाहर घर की ओर पीठ करके बैठ गया और यह विचार कर कि यदि पत्नी पर नजर पड़ी, तो अनिष्ट नहीं हो जाए। परिवार के अन्य सदस्यों ने घर के अन्दर चलने का काफी अनुरोध किया, किन्तु वह नहीं गया और न ही रास्ते में घटित घटना के बारे में किसी को बताया।
उसकी पत्नी को जब पता चला, तो उसने कहा कि चलो, मैं ही चलकर उन्हें घर के अन्दर लाती हूँ। पत्नी ने जब उससे कहा कि आप मेरी ओर क्यों नहीं देखते हो, तो भी चुप रहा। काफी अनुरोध करने के उपरान्त उसने रास्ते का सारा वृतान्त कह सुनाया। पत्नी ने कहा कि मैं भी पतिव्रता स्त्री हूँ। ऐसा कैसे हो सकता है? आप मेरी ओर अवश्य देखो। पत्नी की ओर देखते ही उसकी आँखों की रोशनी चली गई और वह गाय के शापवश पत्नी को नहीं देख सका।
पत्नी पति को साथ लेकर राजा जनक के दरबार में गई और सारा कह सुनाया। राजा जनक ने राज्य के सभी विद्वानों को सभा में बुलाकर समस्या बताई और गौ-शाप से निवृत्ति का सटीक उपाय पूछा। सभी विद्वानों ने आपस में मन्त्रणा करके एक उपाय सुझाया कि, यदि कोई पतिव्रता स्त्री छलनी मेम गंगाजल लाकर उस जल के छींटे इस व्यक्ति की दोनों आँखों पर लगाए, तो गौ-शाप से मुक्ति मिल जाएगी और इसकी आँखों की रोशनी पुनः लौट सकती है।
राजा ने पहले अपने महल के अन्दर की रानियों सहित सभी स्त्रियों से पूछा, तो राजा को सभी के पतिव्रता होने में संदेह की सूचना मिली। अब तो राजा जनक चिन्तित हो गए। तब उन्होंने आस-पास के सभी राजाओं को सूचना भेजी कि उनके राज्य में यदि कोई पतिव्रता स्त्री है, तो उसे सम्मान सहित राजा जनक के दरबार में भेजा जाए।
जब यह सूचना राजा दशरथ (अयोध्या नरेश) को मिली, तो उसने पहले अपनी सभी रानियों से पूछा। प्रत्येक रानी का यही उत्तर था कि राजमहल तो क्या आप राज्य की किसी भी महिला यहाँ तक कि झाडू लगाने वाली, जो कि उस समय अपने कार्यों के कारण सबसे निम्न श्रेणि की मानी जाती थी, से भी पूछेंगे, तो उसे भी पतिव्रता पाएँगे। राजा दशरथ को इस समय अपने राज्य की महिलाओं पर आश्चर्य हुआ और उसने राज्य की सबसे निम्न मानी जाने वाली सफाई वाली को बुला भेजा और उसके पतिव्रता होने के बारे में पूछा। उस महिला ने स्वीकृति में गर्दन हिला दी।
तब राजा ने यह दिखाने कर लिए कि अयोध्या का राज्य सबसे उत्तम है, उस महिला को ही राज-सम्मान के साथ जनकपुर को भेज दिया। राजा जनक ने उस महिला का पूर्ण राजसी ठाठ-बाट से सम्मान किया और उसे समस्या बताई। महिला ने कार्य करने की स्वीकृति दे दी। महिला छलनी लेकर गंगा किनारे गई और प्रार्थना की कि, ‘हे गंगा माता! यदि मैं पूर्ण पतिव्रता हूँ, तो गंगाजल की एक बूँद भी नीचे नहीं गिरनी चाहिए।’ प्रार्थना करके उसने गंगाजल को छलनी में पूरा भर लिया और पाया कि जल की एक बूँद भी नीचे नहीं गिरी। तब उसने यह सोचकर कि यह पवित्र गंगाजल कहीं रास्ते में छलककर नीचे नहीं गिर जाए, उसने थोड़ा-सा गंगाजल नदी में ही गिरा दिया और पानी से भरी छलनी को लेकर राजदरबार में चली आयी।
राजा और दरबार में उपस्थित सभी नर-नारी यह दृश्य देक आश्चर्यचकित रह गए तथा उस महिला को ही उस व्यक्ति की आँखों पर छींटे मारने का अनुरोध किया और पूर्ण राजसम्मान देकर काफी पारितोषिक दिया। जब उस महिला ने अपने राज्य को वापस जाने की अनुमति माँगी, तो राजा जनक ने अनुमति देते हुए जिज्ञाशावश उस महिला से उसकी जाति के बारे में पूछा। महिला द्वारा बताए जाने पर, राजा आश्चर्यचकित रह गए।
सीता स्वयंवर के समय यह विचार कर कि जिस राज्य की सफाई करने वाली इतनी पतिव्रता हो सकती है, तो उसका पति कितना शक्तिशाली होगा? यदि राजा दशरथ ने उसी प्रकार के किसी व्यक्ति को स्वयंवर में भेज दिया, तो वह तो धनुष को आसानी से संधान कर सकेगा और कहीं राजकुमारी किसी निम्न श्रेणी के व्यक्ति को न वर ले, अयोध्या नरेश को राजा जनक ने निमन्त्रण नहीं भेजा, किन्तु विधाता की लेखनी को कौन मिटा सकता है? अयोध्या के राजकुमार वन में विचरण करते हुए अपने गुरु के साथ जनकपुर पहुँच ही गए और धनुष तोड़कर राजकुमार राम ने सीता को वर लिया।

ग्रह पीड़ा निवारक टोटके

ग्रह पीड़ा निवारक टोटके-
सूर्य
१॰ सूर्य को बली बनाने के लिए व्यक्ति को प्रातःकाल सूर्योदय के समय उठकर लाल पूष्प वाले पौधों एवं वृक्षों को जल से सींचना चाहिए।
२॰ रात्रि में ताँबे के पात्र में जल भरकर सिरहाने रख दें तथा दूसरे दिन प्रातःकाल उसे पीना चाहिए।
३॰ ताँबे का कड़ा दाहिने हाथ में धारण किया जा सकता है।
४॰ लाल गाय को रविवार के दिन दोपहर के समय दोनों हाथों में गेहूँ भरकर खिलाने चाहिए। गेहूँ को जमीन पर नहीं डालना चाहिए।
५॰ किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्य पर जाते समय घर से मीठी वस्तु खाकर निकलना चाहिए।
६॰ हाथ में मोली (कलावा) छः बार लपेटकर बाँधना चाहिए।
७॰ लाल चन्दन को घिसकर स्नान के जल में डालना चाहिए।
सूर्य के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु रविवार का दिन, सूर्य के नक्षत्र (कृत्तिका, उत्तरा-फाल्गुनी तथा उत्तराषाढ़ा) तथा सूर्य की होरा में अधिक शुभ होते हैं।

चन्द्रमा
१॰ व्यक्ति को देर रात्रि तक नहीं जागना चाहिए। रात्रि के समय घूमने-फिरने तथा यात्रा से बचना चाहिए।
२॰ रात्रि में ऐसे स्थान पर सोना चाहिए जहाँ पर चन्द्रमा की रोशनी आती हो।
३॰ ऐसे व्यक्ति के घर में दूषित जल का संग्रह नहीं होना चाहिए।
४॰ वर्षा का पानी काँच की बोतल में भरकर घर में रखना चाहिए।
५॰ वर्ष में एक बार किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान अवश्य करना चाहिए।
६॰ सोमवार के दिन मीठा दूध नहीं पूना चाहिए।
७॰ सफेद सुगंधित पुष्प वाले पौधे घर में लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।
चन्द्रमा के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु सोमवार का दिन, चन्द्रमा के नक्षत्र (रोहिणी, हस्त तथा श्रवण) तथा चन्द्रमा की होरा में अधिक शुभ होते हैं।

मंगल
१॰ लाल कपड़े में सौंफ बाँधकर अपने शयनकक्ष में रखनी चाहिए।
२॰ ऐसा व्यक्ति जब भी अपना घर बनवाये तो उसे घर में लाल पत्थर अवश्य लगवाना चाहिए।
३॰ बन्धुजनों को मिष्ठान्न का सेवन कराने से भी मंगल शुभ बनता है।
४॰ लाल वस्त्र लिकर उसमें दो मुठ्ठी मसूर की दाल बाँधकर मंगलवार के दिन किसी भिखारी को दान करनी चाहिए।
५॰ मंगलवार के दिन हनुमानजी के चरण से सिन्दूर लिकर उसका टीका माथे पर लगाना चाहिए।
६॰ बंदरों को गुड़ और चने खिलाने चाहिए।
७॰ अपने घर में लाल पुष्प वाले पौधे या वृक्ष लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।
मंगल के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु मंगलवार का दिन, मंगल के नक्षत्र (मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा) तथा मंगल की होरा में अधिक शुभ होते हैं।

बुध
१॰ अपने घर में तुलसी का पौधा अवश्य लगाना चाहिए तथा निरन्तर उसकी देखभाल करनी चाहिए। बुधवार के दिन तुलसी पत्र का सेवन करना चाहिए।
२॰ बुधवार के दिन हरे रंग की चूड़ियाँ हिजड़े को दान करनी चाहिए।
३॰ हरी सब्जियाँ एवं हरा चारा गाय को खिलाना चाहिए।
४॰ बुधवार के दिन गणेशजी के मंदिर में मूँग के लड्डुओं का भोग लगाएँ तथा बच्चों को बाँटें।
५॰ घर में खंडित एवं फटी हुई धार्मिक पुस्तकें एवं ग्रंथ नहीं रखने चाहिए।
६॰ अपने घर में कंटीले पौधे, झाड़ियाँ एवं वृक्ष नहीं लगाने चाहिए। फलदार पौधे लगाने से बुध ग्रह की अनुकूलता बढ़ती है।
७॰ तोता पालने से भी बुध ग्रह की अनुकूलता बढ़ती है।
बुध के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु बुधवार का दिन, बुध के नक्षत्र (आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती) तथा बुध की होरा में अधिक शुभ होते हैं।

गुरु
१॰ ऐसे व्यक्ति को अपने माता-पिता, गुरुजन एवं अन्य पूजनीय व्यक्तियों के प्रति आदर भाव रखना चाहिए तथा महत्त्वपूर्ण समयों पर इनका चरण स्पर्श कर आशिर्वाद लेना चाहिए।
२॰ सफेद चन्दन की लकड़ी को पत्थर पर घिसकर उसमें केसर मिलाकर लेप को माथे पर लगाना चाहिए या टीका लगाना चाहिए।
३॰ ऐसे व्यक्ति को मन्दिर में या किसी धर्म स्थल पर निःशुल्क सेवा करनी चाहिए।
४॰ किसी भी मन्दिर या इबादत घर के सम्मुख से निकलने पर अपना सिर श्रद्धा से झुकाना चाहिए।
५॰ ऐसे व्यक्ति को परस्त्री / परपुरुष से संबंध नहीं रखने चाहिए।
६॰ गुरुवार के दिन मन्दिर में केले के पेड़ के सम्मुख गौघृत का दीपक जलाना चाहिए।
७॰ गुरुवार के दिन आटे के लोयी में चने की दाल, गुड़ एवं पीसी हल्दी डालकर गाय को खिलानी चाहिए।
गुरु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु गुरुवार का दिन, गुरु के नक्षत्र (पुनर्वसु, विशाखा, पूर्व-भाद्रपद) तथा गुरु की होरा में अधिक शुभ होते हैं।

शुक्र
१॰ काली चींटियों को चीनी खिलानी चाहिए।
२॰ शुक्रवार के दिन सफेद गाय को आटा खिलाना चाहिए।
३॰ किसी काने व्यक्ति को सफेद वस्त्र एवं सफेद मिष्ठान्न का दान करना चाहिए।
४॰ किसी महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए जाते समय १० वर्ष से कम आयु की कन्या का चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेना चाहिए।
५॰ अपने घर में सफेद पत्थर लगवाना चाहिए।
६॰ किसी कन्या के विवाह में कन्यादान का अवसर मिले तो अवश्य स्वीकारना चाहिए।
७॰ शुक्रवार के दिन गौ-दुग्ध से स्नान करना चाहिए।
शुक्र के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शुक्रवार का दिन, शुक्र के नक्षत्र (भरणी, पूर्वा-फाल्गुनी, पुर्वाषाढ़ा) तथा शुक्र की होरा में अधिक शुभ होते हैं।

शनि
१॰ शनिवार के दिन पीपल वृक्ष की जड़ पर तिल्ली के तेल का दीपक जलाएँ।
२॰ शनिवार के दिन लोहे, चमड़े, लकड़ी की वस्तुएँ एवं किसी भी प्रकार का तेल नहीं खरीदना चाहिए।
३॰ शनिवार के दिन बाल एवं दाढ़ी-मूँछ नही कटवाने चाहिए।
४॰ भड्डरी को कड़वे तेल का दान करना चाहिए।
५॰ भिखारी को उड़द की दाल की कचोरी खिलानी चाहिए।
६॰ किसी दुःखी व्यक्ति के आँसू अपने हाथों से पोंछने चाहिए।
७॰ घर में काला पत्थर लगवाना चाहिए।
शनि के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शनिवार का दिन, शनि के नक्षत्र (पुष्य, अनुराधा, उत्तरा-भाद्रपद) तथा शनि की होरा में अधिक शुभ होते हैं।

राहु
१॰ ऐसे व्यक्ति को अष्टधातु का कड़ा दाहिने हाथ में धारण करना चाहिए।
२॰ हाथी दाँत का लाकेट गले में धारण करना चाहिए।
३॰ अपने पास सफेद चन्दन अवश्य रखना चाहिए। सफेद चन्दन की माला भी धारण की जा सकती है।
४॰ जमादार को तम्बाकू का दान करना चाहिए।
५॰ दिन के संधिकाल में अर्थात् सूर्योदय या सूर्यास्त के समय कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीम करना चाहिए।
६॰ यदि किसी अन्य व्यक्ति के पास रुपया अटक गया हो, तो प्रातःकाल पक्षियों को दाना चुगाना चाहिए।
७॰ झुठी कसम नही खानी चाहिए।
राहु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शनिवार का दिन, राहु के नक्षत्र (आर्द्रा, स्वाती, शतभिषा) तथा शनि की होरा में अधिक शुभ होते हैं।

केतु
१॰ भिखारी को दो रंग का कम्बल दान देना चाहिए।
२॰ नारियल में मेवा भरकर भूमि में दबाना चाहिए।
३॰ बकरी को हरा चारा खिलाना चाहिए।
४॰ ऊँचाई से गिरते हुए जल में स्नान करना चाहिए।
५॰ घर में दो रंग का पत्थर लगवाना चाहिए।
६॰ चारपाई के नीचे कोई भारी पत्थर रखना चाहिए।
७॰ किसी पवित्र नदी या सरोवर का जल अपने घर में लाकर रखना चाहिए।
केतु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु मंगलवार का दिन, केतु के नक्षत्र (अश्विनी, मघा तथा मूल) तथा मंगल की होरा में अधिक शुभ होते हैं।

व्यवसाय वृद्धि-कारक प्रयोग

व्यवसाय वृद्धि-कारक प्रयोग
१॰ दुकान में लोबान की धूप लगानी चाहिए।
२॰ शनिवार के दिन दुकान के मुख्य द्वार पर बेदाग नींबू एवं सात मिर्चें लटकानी चाहिए।
३॰ नागदमन के पौधे की जड़ लाकर इसे दुकान के बाहर लगा देना चाहिए। इससे बंधी दुकान खुल जाती है।
४॰ दुकान के गल्ले में शुभ मुहूर्त में श्रीफल लाल वस्त्र में लपेटकर रख देना चाहिए।
५॰ प्रतिदिन संध्या के समय दुकान में माता लक्ष्मी के सामने शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करना चाहिए।
६॰ व्यापारिक प्रतिष्ठान तथा दुकान को नजर से बचाने के लिए काले घोड़े की नाल को मुख्य द्वार की चौखट के ऊपर ठोकना चाहिए।
७॰ दुकान में मोरपंख की झाडू लेकर निम्नलिखित मन्त्र के द्वारा सभी दिशाओं में झाडू को घुमाकर वस्तुओं को साफ करना चाहिएः-”ॐ ह्रीं ह्रीं क्रीं”।
८॰ शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी के सम्मुख मोगरे या चमेली के पुष्प अर्पित करने चाहिए।
९॰ यदि आपके व्यवसायिक प्रतिष्ठान में चूहे आदि जानवरों के बिल हों तो उन्हें बंद करवाकर बुधवार के दिन गणपति को प्रसाद चढ़ाना चाहिए।
१०॰ सोनवार के दिन अशोक वृक्ष के अखंडित पत्ते लाकर स्वच्छ जल से धोकर दुकान के मुख्य द्वार पर टांगना चाहिए।
११॰ सूती धागे को पीसी हल्दी में रंगकर उसमें अशोक पत्र को बांधकर लटकाना चाहिए।
१२॰ यदि आपको यह शंका हो कि किसी व्यक्ति ने आपके व्यवसाय को बांध दिया है या उसकी नजर आपकी दुकान को लग गई है तो उस व्यक्ति का नाम काली स्याही से भोजपत्र पर लिखकर पीपल वृक्ष के पास भूमि खोदकर दबा देना चाहिए तथा इस प्रयोग को करते समय किसी अन्य व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए। यदि पीपल निर्जन स्थान में हो तो अधिक अनुकूलता रहेगी।
१३॰ कच्चा सूत लेकर उसे शुद्ध केसर में रंगकर अपनी दुकान पर बांध देना चाहिए।
१४॰ हुदहुद पक्षी की कलंगी रविवार के दिन प्रातःकाल दुकान पर लाकर रखने से व्यवसाय को लगी नजर समाप्त होती है और व्यवसाय में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है।
१५॰ व्वयसाय वृद्धि के लिए ११ माला प्रतिदिन निम्न मन्त्र का जाप करें-”ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नमो भगवती माहेश्वरी अन्नपूर्णा स्वाहा”।
१६॰ यदि आपके प्रयासों के उपरान्त भी व्यवसाय वृद्धि न कर रहा हो तो निम्न उपाय करें- किसी भी मास के शुक्ल पक्ष के गुरुवार को व्यापार स्थल के मुख्य द्वार के कोने को गंगाजल से धोकर स्वच्छ कर लें। इसके उपरान्त हल्दी से सतिया (स्वस्तिक) बनाकर उसपर थोड़ी सी चने की दाल और गुड़ रख दें। इसके बाद उस स्वस्तिक को बार-बार नहीं देखें। इस प्रकार प्रत्येक गुरुवार को यह क्रिया करें। कम से कम ११ गुरुवार तक तो करें ही।
१७॰ रविवार के दिन प्रातःकाल दुकान खोलते समय दाँये हाथ में थोड़े से काले साबुत उड़द लेकर नीचे लिखे मन्त्र का २१ बार उच्चारण करते हुए बिखेर दें और दूसरे दिन इन्हें बुहार कर काले कपड़े में एकत्रित करके काले धागे से उस कपड़े का मुख बाँधकर किसी चौराहे पर स्वयं डाल आवें। ऐसा चार रविवार तक करें। “भंवरवीर तू चेला मेरा, खोल दुकान कहा कर मेरा। उठे जो डण्डी बिके जो माल भंवर वीर सों नहीं जाय।।”
१८॰ शनिवार की संध्या को हाथ में इक साबुत सुपारी व ताँबे का सिक्का ले जाकर उस पेड़ को आमंत्रित कर आवें, जिस पेड़ पर चमगादड़ों का आवास हो। रविवार को सूर्योदय से पूर्व उस पेड़ की एक शाखा लाकर उसका एक टुकड़ा व्यापारिक आसन या गद्दी के नीचे रखें तथा उस वृक्ष का एक पत्ता सिर पर इस प्रकार धारण करें कि उस पर किसी व्यक्ति की दृष्टि न पड़े।vaibhav_vridhi_kuber
१९॰ शुभ मुहूर्त में पूर्व की ओर मुख करके अनार की कलम और अष्टगंध की स्याही से सफेद कागज पर निम्नांकित यन्त्र (२५ कोष्ठकों वाले एक यन्त्र में क्रमशः बाँये से दाँये १०, १८, १, १४, २२, ११, २४, ७, २०, ३, १७, ५, १३, २१, ९, २३, ६, १९, २, १५, ४, १२, २५, ८ तथा १६ लिखें) बनाकर, मिट्टी के पात्र में रखकर, उस पर लाल सूती कपड़े का टुकड़ा व नारियल चढ़ाकर, व्यापारी को अपनी गद्दी के नीचे बिना किसी के टोके गाढ़ देनी चाहिए।
२०॰ प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर गणेशजी की दो छोटी मूर्तियाँ या तस्वीर इस प्रकार लगाएँ कि एक की दृष्टि बाहर की ओर तथा दूसरे की दृष्टि अन्दर की तरफ रहे।
२१॰ दुकान का मालिक नैर्ऋत्य कोण या पश्चिम में पूर्वाभिमुख होकर बैठे।
२२॰ दुकान के सभी वास्तु दोषों को दूर करने के लिए प्रातः पोंछा लगाते समय पानी में सेंधा नमक या साँभर नमक डालकर पोंछा लगाना चाहिए।

आज का दिन कैसा बीतेगा

आज का दिन कैसा बीतेगाday-pridiction

पंचांग से वर्त्तमान नक्षत्र ज्ञात करें। फिर  दिए गये चक्र के समान एक चक्र बनायें। इस चक्र में जहां १ लिखा है, वहां उस दिन का प्रातःकालीन नक्षत्र को लिखकर उससे आगे के नक्षत्रों को क्रमशः २, ३, ४ आदि अंकों के स्थान पर लिखते हुए अभिजित् सहित २८ नक्षत्रों को चक्र में लिख लें।
अब देखें की आपके नाम का नक्षत्र कहां है?
यदि वह चक्र के अन्दर (गोल घेरे में) है तो वह दिन सुख-शान्ति से व्यतीत होगा, उस दिन कोई शुभ समाचार मिलेगा। यदि नाम नक्षत्र चक्र के बाहर हो तो दिन का आधा भाग प्रसन्नता से बीते तथा शेषभाग में चिन्ता, दुःखशोक से चित्त खिन्न हो। यदि नामनक्षत्र त्रिशूल पर पड़े तो वह पूरा दिन विवाद, हानि, दुर्घटना आदि से चित्त की अशान्ति का कारण बने।

स्वर-विज्ञान

स्वर विज्ञान

प्राण वायु मनुष्य के शरीर में श्वास लेने पर नासिका के माध्यम से प्रवेश करती है। नासिका में दो छिद्र होते हैं, जो बीच में एक पतली हड्डी के कारण एक दूसरे से अलग रहते हैं। मनुष्य कभी दाहिने छिद्र से और कभी बाँएँ छिद्र से श्वास लेता है। दाहिने छिद्र से श्वास लेते समय “दाहिना स्वर” तथा बाँएँ छिद्र से श्वास लेते समय “बाँयाँ स्वर” चलता है। अर्थात् श्वास-प्रश्वास की गति जिस नासिका छिद्र से प्रतीत हो, उस समय वही स्वर चलता समझें। यदि दोनों नासिका-छिद्रों से समान रुप से निःश्वास होता हो, तो उसे “मध्य स्वर” कहते हैं। यह स्वर प्रायः उस समय चलता है, जब स्वर परिवर्तन होने को होता है।
वस्तुतः नासिका के भीतर से जो श्वास निकलती है, उसी का नाम “स्वर” है। जब दाहिना स्वर चलता हो तो, सूर्य का उदय जानना चाहिए। इसीलिए दाहिने स्वर को “सूर्य स्वर” भी कहते है तथा बाँएँ स्वर को “चन्द्र स्वर”
स्वर का सम्बन्ध नाड़ियों से है। यद्यपि शरीर में ७२,००० नाड़ियाँ हैं तथापि इनमें से २४ प्रधान है और इन २४ में से १० अति प्रधान तथा इन १० में से भी ३ नाड़ियाँ अतिशय प्रधान मानी गई है, जिनके नाम इड़ा, पिंगला तथा सुषम्णा है।
शरीर में मेरु-दण्ड के दक्षिण (दाहिने) दिशा की तरफ पिंगला (सूर्य) नाड़ी, वाम (बाँईं) तरफ इड़ा (चन्द्र) नाड़ी तथा दोनों के मध्य सुषम्णा नाड़ी है। सुषम्णा नाड़ी के प्रकाश से दोनों नथुनों से स्वर चलता है।

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भविष्य-ज्ञान-प्रश्नावली

भविष्य-ज्ञान-प्रश्नावली


 
१६
१३ १२
१५ १०
११ १४
 

यह प्रश्नावली चौंतीसा यन्त्र के आधार पर बनाई गई है। प्रश्न करने वाला श्री सच्चिदानन्द स्वरुप भगवान् का स्मरण कर नीचे लिखे प्रश्नों में से अपने प्रश्न का उच्चारण करे तथा बाँयी ओर दिये ३४सा यन्त्र के किसी कोष्ठक में अंगुली रखे। इसके पश्चात् प्रश्न संख्या तथा कोष्ठक अंक को जोड़कर उसमें से एक घटायें। जो शेष बचे उस संख्या के सामने जिस देवता का नाम लिखा हो, उसी देवता के प्रश्न-फल में चौंतिसा यन्त्र में अंगुली रखे हुए कोष्ठक के अंक पर अपने प्रश्न का उत्तर पायें। यदि कोष्ठक अंक तथा प्रश्न संख्या का जोड़ ३४ से अधिक हो तो योगफल में से ३४ घटाकर शेष क्रिया करें।


सन्तान सुख होगा या नहीं? गणेश   १८ मेरी चिंता दूर होगी या नहीं? शनि
मुकदमे में हार होगी या जीत? ब्रह्मा   १९ मित्र के साथ कैसी बनेगी? राहु
भाग्योदय कब होगा? विष्णु   २० कर्ज मिलेगा या नहीं? केतु
नौकरी मिलेगी या नहीं? शिव   २१ खोई वस्तु मिलेगी या नहीं? ध्रुव
तरक्की का योग है या नहीं? इन्द्र   २२ परदेशी कब आयेगा? यम
खेती में लाभ होगा या हानि? अग्नि   २३ यात्रा से लाभ मिलेगा या हानि? विश्वेदेवा
मकान बनेगा या नहीं? वायु   २४ भाइयों में कैसी बनेगी? यक्ष
पास होऊंगा या फेल? सूर्य   २५ कुआं बनेगा या नहीं? भैरव
विद्या प्राप्त होगी या नहीं? चन्द्रमा   २६ यह वर्ष कैसा रहेगा? वासुकि
१० मेरा जीवन कैसा व्यतीत होगा? वसुदेव   २७ आज का दिन कैसा रहेगा? कुबेर
११ जीवन में सफलता मिलेगी या नहीं? वरुण   २८ पुत्र होगा या कन्या? मित्र
१२ गड़ा धन मिलेगा या नहीं? पृथ्वी   २९ मेरी इच्छा पूरी होगी या नहीं? जयन्त
१३ विवाह होगा या नहीं? अश्विनी कुमार   ३० स्त्री स्वभाव में कैसी मिलेगी? तक्षक
१४ बीमार अच्छा होगा या नहीं? मंगल   ३१ सम्बन्धी धोखा तो नहीं देगा? शेष
१५ स्वप्न फल कैसा है? बुध   ३२ अमुक स्त्री मुझे प्रेम करती है या नहीं? काम
१६ तबादला होगा या नहीं? बृहस्पति   ३३ तीर्थ यात्रा को जाना होगा या नहीं? काल
१७ व्यापार से लाभ रहेगा या हानि? शुक्र   ३४ मन्दिर बनेगा या नहीं? अनन्त

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रमल प्रश्नावली

ramal-prashnavaliरमल प्रश्नावली
इस प्रश्नावली का तरीका है कि चंदन की लकड़ी का चौकोर पासा बनाकर उस पर १, २, ३, ४ खुदवा लें। फिर अपने कार्य का चिंतन करते हुए तीन बार पासा छोड़ें। उसका जो अंक आये, उसी अंक पर फल देखें। यदि किसी के पास पासा नहीं हो तो, नीचे दी गई सारणी में अनामिका अंगुली रखकर उसका फल देखें।
रमल प्रश्नावली
१११॰ मंगल भवन अमंगल हारी, पूरी होगी मनोकामना थारी।
११२॰ इष्ट देव का ध्यान धरोगे, मन इच्छा सब काम करोगे।
११३॰ होत काम में हुआ अंधेरा, बैरी पहुंच गया है तेरा।
११४॰ झटपट करो देर नहीं लाओ, यह अवसर फेर नहीं पाओ।
१२१॰ जो तुम मन में नहीं उपाई, होगा काम ढील से भाई।
१२२॰ आगे विघ्न है बड़ा भारी, ईश्वर राखे लाज तुम्हारी।
१२३॰ संकट हटे सर्व सुख आया, दिन-दिन दुगुनी बढ़े माया।
१२४॰ वा शुभ काम करो दिन राती, पांच जिमादे गोती नाती।
१३१॰ कपट भेद है मन में उसके, करि विश्वास जाय तु जिसके।
१३२॰ होगी फतह देर नहीं लाओ, सूरज से तुम विनय सुनाओ।
१३३॰ दुविधा हटे सर्व सुख पाओ, गुरु गोविंद से ध्यान लगाओ।
१३४॰ बार-बार समझाऊँ थाने, आज भला नहीं दीखे म्हाने।
१४१॰ विपत्तियाँ बीत गयी सब पाछे, अब तो दिन आवेंगे आछे।
१४२॰ अब सुनता ना कोई तेरी, घर में पैठि रहा हऔ बेरी।
१४३॰ धन परिवार सदा सुखदाई, कर्म विपाक देख ले भाई।
१४४॰ रात दिना की चिंता भारी, कुछ दिन में मिट जाये थारी।
२११॰ जर जमीन होवे फिर होवे, चिंता करि तन को क्यों खोवे।
२१२॰ यह तो काम बड़ा दुखदाई, कर्म-विपाक देख लो भाई।
२१३॰ सत्य बात तुम सुन लो म्हारी, तिगरी लाग रही है थारी।
२१४॰ हिम्मत बड़ी भरोसा खोटा, कर्म-विपाक देख दुख मोटा।
२२१॰ कितना ही गुण कर मनमाहीं, यश तुमको मिलने का नाहीं।
२२२॰ होगी फतह देर नहीं लाओ, रविवार को व्रत बनाओ।
२२३॰ संकट देखि डरे क्यों भाई, ईश्वर थारी करे सहाई।
२२४॰ धर्म हार धन कोई खाओ, मन अपने में क्यों घबराओ।
२३१॰ सोच समझ के करना भाई, बिन सोचे होता दुखदाई।
२३२॰ रस्ते में जो भूखा टोहवो, भोजन देके निर्भय सोवो।
२३३॰ भली बुरी उसके ही हाथ, निर्धनी धनी बना वही नाथ।
२३४॰ यह अवसर करने का नाहीं, चुप बैठि रहो घर माहीं।
२४१॰ वह तुमसे लेने को डोले, इस कारण मुख मीठा बोले।
२४२॰ धीरज धरि रहो उर माहीं, गयी वस्तु घर आवे नाहीं।
२४३॰ किया कबूल भूलि गया भाई, वो ही थारी करे सहाई।
२४४॰ उदय पाप हो गये अब सारे, कर्म-विपाक देखिल्यो थारे।
३११॰ तीन बार ऊकी है तेरी, पीछे लाग रहा है बैरी।
३१२॰ करि कुछ यतन देर नहीं करना, करले जाप नहीं दुख भरना।
३१३॰ जो तुम मन में नई उपाई, होगा काम ढील से भाई।
३१४॰ करि विश्वास सत्य सुनि भाई, संकट मिटे होय सुखदाई।
३२१॰ यह तो बात नई बनि आई, कर्म-विपाक देख लो भाई।
३२२॰ करि विश्वास सत्य सुनि भाई, संकट मिटे होय सुखदाई।
३२३॰ करना हो सो जल्दी करिइ, ध्यान गुरु का हृदय धरिए।
३२४॰ तुम तो सबकी करो भलाई, ईश्वर राखै लाज सदाई।
३३१॰ जस तुम को मिलना नहीं भाई, चाहे जितनी करो भलाई।
३३२॰ कर ले काम देर नहीं करना, ईश्वर ध्यान हिये में धरना।
३३३॰ देखि चंद्रमा काम करोगे, नित नये मंगल मोद भरोगे।
३३४॰ जिस नर की तुम करते आशा, उसका कौन करे विश्वासा।
३४१॰ तुम जानो अपना सा मनकी, बुद्धि बदलि रही उस तन की।
३४२॰ अब तो समझि देखि मनमाहीं, घात ग्रह बिन होता नाहीं।
३४३॰ करिले यतन काम है नीका, अब तो फिकर मिटेगा जी का।
३४४॰ दुर्गा पठित कराना भाई, तो यह संकट वेग नसाई।
४११॰ चुपके बैठि रहो घर माहीं, यह अवसर करने का नाहीं।
४१२॰ करि विश्वास जाय जो कोई, उसकी हानि कभी नहीं होई।
४१३॰ यह सब दोष कर्म का भाई, कर्म-विपाक देख लो भाई।
४१४॰ मन अपने को डाटो भाई, मन के डटे सर्व सुखदाई।
४२१॰ शुभ आचरण बने रहो भाई, तो सुख सम्पत्ति रहे सदाई।
४२२॰ अपने मन में तुम्हीं विचारो, भूलि गये सो बेगि संभारो।
४२३॰ ये है दोष कर्म के भाई, करि कुछ जाय लेय छुटवाई।
४२४॰ मनि अपने को राखि जचाया, अब तो दिन अच्छे बन आया।
४३१॰ करिले यतन देर नहीं करना, इष्ट देव की ले ले सरना।
४३२॰ वो तोरी सब भली करेगा, उस ही से सब काम सरेगा।
४३३॰ अब तो फिकर तजो तुम भाई, कुछ दिन गये होय सुखदाई।
४३४॰ धीरज धरो फिकर तजि डारो, है ईश्वर को बड़ो सहारो।
४४१॰ नीच निचाई नहीं तजेंगे, फिर भी सज्जन राम भजेंगे।
४४२॰ मन अपने करो विचारा, इस तन को देखो रखवारा।
४४३॰ रोस देव का तुम पर भारी, पहिले उसकी करो मनुहारी।
४४४॰ ठहर-ठहर कर जागे जोती, कुछ दिन गये सिद्ध सब होती।

New version of sholey

ई-मेल पर श्वेता जी ने एक मजेदार वार्त्तालाप भेजा है, आप भी आनन्द लीजिये
Jay : Mausi, ladka Satyam mein kaam karta hai..
Mausi : Hai ram..!!! Aur kahin try kar raha hai kya??

Jay : kahan mausi, 2 saal Satyam me rahne ke baad koi Company leti kahan hai…
Mausi : Hi Raam to kya 2 saal se Satyam mein hi hai..

Jay : haan socha tha 2 saal me salary hike hogi hi. Aajkal to salary
bhi jyada NAHI mil rahi hai use..
Mausi : To kya salary BHI KAM milti HAI..?

Jay : Ab appraisal bhi to asaani se kahaan hota hai mausi..
Mausi : Hai hai …!! To kya appraisal bhi nahi hota uska..?
Jay : Senior se ladhai karne ke baad appraisal mein achhi rating to
nahin milti hai na… Mausi..
Mausi : To kya seniors se ladhta bhi hai..?

Jay : Ab 2 saal tak onsite Jane ko na mile to ho jaati hai kabhi kabhi anban..
Mausi : To kya AB tak ek baar bhi onsite nahi gaya ..???

Jay : Ab Outdated technology ke developer ki kismat mein to yehi
likha hai mausi..
Mausi : kya kaha ladka Outdated technology mein kaam karata hai..!!!

Mausi : Kaunse college se padhai ki hai..?
Jay : Uska pataa lagte hi hum aapko khabar de denge!!

Jay : To main rishta pakka samjhuna mausi???
Mausi : Beta, kan khol kar sun Le…Sagi mausi hoon basanti ki, koi
sauteli maa nahi….Bhale hi hamaari Basanti Call Center wale Chandu
se shaadi kar Le par Satyam ke employee se katai nahin karegi