गोवर्धन पर्वत धारण करने पर नीचे की भुमि जलमग्न क्यों नहीं हुई?
एक समय शिवजी ने पार्वती जी के सामने सन्तों की बड़ी महिमा गाई। सन्तों की महिमा सुनकर पार्वती जी की श्रद्धा उमड़ी और उसी दिन उन्होंने श्री अगस्त्य मुनि को भोजन का निमन्त्रण दे डाला तथा शिवजी को बाद में इस बाबत बतलाया तो सुनकर शिवजी हंसे और कहा “आज ही तो सन्तों में श्रद्धा हुई और आज ही ऐसे सन्त को न्यौता दे दिया। अगर किसी को भोजन कराना ही था, तो किसी कम भोजन करने वाले मुनि को ही न्यौता दे देती। तुम अगस्त्य को नहीं जानती तीन चुल्लू में समुद्र सोख गए थे। भला इनका पेट भरना कोई हंसी खेल है। यदि भुखे रह गए तो लोक में बड़ी निन्दा होगी। जीवन में एक बार शिव के यहाँ गए और भूखे ही लौटे। भद्रे! कार्य विचार कर नहीं किया।” पार्वती जी बोलीं-”अब तो न्यौता दे ही दिया उसमें उलट-फेर होने की नहीं, चाहे जो भी हो।”
शिवजी बोले-”तो तुम जानो तुम्हारा काम जाने, मैं तो चुपचाप राम-राम जपूँगा।” पार्वती जी तो साक्षात् अन्नपूर्णा ठहरी उन्होनें सोचा जब मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को पूर्ण भोजन करा देती हूँ, तो एक ऋषि का पेट नहीं भर सकती। अवश्य तृप्त ही नहीं महातृप्त करके भेजूँगी। फिर क्या था, बड़े जोर-शोर से तैयारी हुई। खाद्यान्नों के पहाड़ लग गए। आखिर कितना खायेंगे ऋषि।
जब अगस्त्य जी खाने को बैठे तो भोजन का कोई हिसाब ही नही। आखिर परोसने वाली साक्षात् अन्नपूर्णा, इतना मधुर और इतना स्वादिष्ट भोजन। पार्वती जी अपनी समस्त सखियों-सहेलियों सहित दौड़-दौड़कर परोसती रहीं कि भोजन का तारतम्य न टूटे। टोकरी की टोकरी थाल में पलट दी जाती थी, किन्तु इधर यह भी खूब रही कि क्षणभर में थाली साफ। खाते-खाते जब अगस्त्य जी की जठराग्नि धधकी तो उन्हें भोजन को हाथ से उठा-उठाकर ग्रास-ग्रास खाने की जरुरत ही नहीं रही। भोजन स्वयं खिंचकर उनके मुँह मे जाने लगा। परोसने वाली सखियां घबरायी कि कहीं भोजन के साथ हम सब भी न खिंची चली जायें।
ऋषि जी का ढ़ंग देखकर माता अन्नपूर्णा भी अचम्भे में पड़ गई। सोचने लगी अब तो भगवान् ही मर्यादा रखेंगे। ठीक कहा था शम्भूजी ने, किन्तु साथ ही पार्वती को शिव पर झुंझलाहट भी हो रही थी कि देखो तो, मैं तो हैरान हूँ। ऐसे समय पर मेरी सहायता के बजाय मुँह फेरे बैठे हैं। निरुपाय अन्नपूर्णा ने भगवान का द्वार खटखटाया। ठीक भी है ‘हारे को हरिनाम’ प्रसिद्ध ही है।
भगवान तुरन्त ही बाल ब्रह्मचारी का रुप धारणकर आ पहुँचे और बोले-”भगवती भिक्षां देही।” पार्वती जी घबरायी “मैं तो एक ही को पूर्ण करने में परेशान हूँ। ये दूसरे समाज सेवक भी आ धमके, सो भी भूखे ही।” परन्तु धर्म से विवश होकर ब्रह्मचारी जी के लिए भी ऋषि के समीप ही आसन लगाया जाने लगा। अगस्त्य जी अपने समीप आसन नहीं लगाने देते थे, किन्तु ब्रह्मचारी भी पूरे जिद्दी थे। अड़ गये कि बैठूंगा तो यहीं। हारकर अगस्त्य जी चुप हो गए। बाल ब्रह्मचारी जी ने थोड़ा सा भोजन पाकर ही आचमन कर लिया। माता पार्वती ने पूछा-”प्रभो! इतनी जल्दी खाना क्यों बन्द कर दिया?” वे बोले-”हम ब्रह्मचारी हैं अधिक खाने से आलस्य प्रमाद आता है, जिससे भजन में बाधा होती है और क्या हम इनकी तरह भूखे थोड़े ही हैं, कि पूर्ण ही न हों।” उधर अगस्त्य जी ने भी संकोच के कारण खाना बन्द कर दिया, कि पंगत में एक खाता रहे और दूसरा आचमन कर ले। दूसरी बात यह कि जो बाद में आया वह पहले खा चुका। खाना तो बन्द कर दिया, किन्तु अगस्त्य जी ने जल नहीं पिया था। वह ब्रह्मचारी पर बिगड़े-”तुमने मुझे जल नहीं पीने दिया।” भगवान ने कृपा करके अपने स्वरुप के दर्शन कराए और कहा-”आप धैर्य धरें। आपको जल मैं द्वापर में पिलाऊँगा। निमन्त्रण मैं आज ही देता हूँ।”
जब इन्द्र ने अपने लिए होने वाले यज्ञ के बन्द होने पर ब्रज डुबोने के लिए अतिवृष्टि की थी तब भगवान ने उस जल का शोषण करने कि लिए अगस्त्य ऋषि को नियुक्त किया था। इस कारण नीचे की जमीन जलमग्न नहीं होने पायी।
शान्ति मन्त्र
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति: पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति: । वनस्पतये: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: सर्वँ शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि ॥ ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥Pages
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